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Friday, July 9, 2021

बैडरूम - ( भाग-9)

 


         ट्रैन से उतर कर देवदत्त औऱ सुहासिनी अभी कुली को बुला ही रहे थे कि अचानक उनका फ़ोन बज उठता है । वो कुली को छोड़ फ़ोन को पिक कर हैलो बोलते हैं । उधर से कोई आवाज नहीं आती । सो तीन चार बार फिर हेलो बोलते हैं,  मगर उधर से कोई आवाज़ नहीं आती तो वो बंद करने के लिए आगे से देखते हैं तो फ़ोन पहले ही बंद होता है । देवदत्त उसे चैक करते हैं तो फ़ोन की बैटरी खत्म हुई होती है ।

फ़ोन को देखते हुए अज़ीब सा मुँह बनाते हुए फ़ोन को जेब में रख फिर से कुली को आवाज़ लगाते हैं ।

सुहासिनी को देवदत्त जी की चाल ढाल से यही महसूस हो रहा था कि घर जाना उनको बोझ सा लग रहा है । उसने पूछ ही लिया।
"अजी आप  उदास क्यूँ हो ?"

"सुहासिनी --- मुझे कुछ अच्छा नहीं लग रहा" --देवदत्त ने धीरे से कहा  ।

                   "आप बच्चों के बारे में ज़्यादा मत सोचा करो । उनका वक़्त है सब ठीक हो जाएगा"---सुहासिनी ने देवदत्त को सांत्वना देते हुए कहा ।

इतने में कुली ने  सामान उठा कर कहा -  "किधर जाना है पहाड़ गंज की तरफ या----"

कुली की बात पूरी भी नही हुई कि देवदत्त ने कहा पहाड़गंज की तरफ ।

कुली ने सामान उठाया और वो दोनों, कुली के पीछे-पीछे स्टेशन से बाहर आ गए ।

बाहर आकर देवदत्त ने कुली से प्रीपेड टैक्सी बूथ की तरफ इशारा किया ही था कि देवदत्त को किसी ने आवाज़ लगाई ।

आवाज़ कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी । दोनों ने पीछे मुड़ कर देखा जो दोनों हैरान ।

सुहासिनी ने एक दम जल्दी- जल्दी पल्लू संभाला और उनके पाँव पड़ते हुए बोली - "अरे जेठ जी आप?"

देवदत्त ने प्रताप को गले लगाया  औऱ पूछा -- "तुम यहाँ स्टेशन पर?"

(देवदत्त ने अपनी शंका दूर करते हुए पूछ लिया क्यूँकि उन्हें तो एयरपोर्ट पर होना चाहिए था )

"कनाडा से कब आये ?" -- देवदत्त ने फिर पूछा ।

"कल" - प्रताप बोला ।

इतने में कुली ने बीच में ही टोका और पैसे मांगे ।

             पैसे देकर वो बुकिंग काउंटर की ओर बढ़ने लगे तो प्रताप ने कहा हमारी गाड़ी में ही चलो ।

देवदत्त ने टोका -- "तुम्हारा काम ?"

प्रताप ने कहा वो सब हो गया है ।
"तो फिर घर चलो" -- देवदत्त ने कहा ।

गाड़ी में बैठ फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ ।

प्रताप ने बच्चों का हाल पूछा तो सुहासिनी ने झट से जवाब दिया सब अच्छा चल रहा है और फिर सुहासिनी ने भी पूछ लिया भाभी तूलिका औऱ टिया,दिया कैसी हैं ?

"सब ठीक हैं । टिया दिया अपने बच्चों में मस्त हैं और ये तूलिका बिज़नेस वोमेन बन चुकी है । फुरसत ही नही है उसे किसी से बात करने की" --हँसते हुए आगे कहा --"देखो न उसी के टूर पर दिल्ली आया हूँ "

देवदत्त अभी तक चुप ही बैठे थे । उन्होंने प्रताप को बोला - "भाई साहब ज़रा फ़ोन मिलाना जरा राजेश या कामिनी को हमारा दोनों का तो फ़ोन ही डिस्चार्ज हो गये हैं ।"

इतने में प्रताप ने कामिनी का फ़ोन मिला कर देवदत्त के हाथ में दे दिया ।

देवदत्त ने फ़ोन सुहासिनी को दे दिया ।

सुहासिनी ने फ़ोन लिया और कान से लगा लिया ।

उधर से कामिनी की आवाज़ आयी-- "हेलो" 

तो सुहासिनी बिना किसी भूमिका के बोली-- "हेलो कामिनी ? पिन्टू कैसा है?"

        उधर से कामिनी का तो जैसे फुट-फुट कर ये हाल हो गया कि उस से बोला ही नहीं जा रहा था ।

माँ बाबू जी का सुबह से कोई फ़ोन न मिल पाना और फिर उनकी कोई खबर भी न मिल पाना और एक के ऊपर एक पहाड़ टूटना । सब एक दम साथ गुबार बन कामिनी के गले में जैसे अटक गया हो ।

सुहासिनी भी घबरा गई और पूछने लगी -- "क्या हुआ बताओ बेटा ?"

    "जल्दी आ जाओ माँ, बाबूजी (रोते-रोते) जल्दी आ जाओ यहाँ कुछ भी ठीक नहीं है"-- कामिनी बोलती चली गयी ।

देवदत्त औऱ प्रताप दोनों ही सुहासिनी की बातें ध्यान से सुन रहे थे ।

देवदत्त ने सुहासिनी को पिन्टू का हाल पूछने को कहा ।

फ़ोन कट चुका था ।

प्रताप ने फिर फ़ोन मिलाया औऱ फ़ोन पिक होने का इंतज़ार करने लगा ।

फ़ोन पिक हुआ--उधर से अबकी किसी आदमी की आवाज़ थी ।

प्रताप ने पूछा - आप कौन?

सर में राजेश का दोस्त हरि बोल रहा हूँ।  कामिनी बात करने की हालत में नहीं हैं ।

👌🏻प्रताप ने झट से पूछा - क्या हुआ कामिनी को?"

हरि का नाम सुनते ही प्रताप से देबदत ने फ़ोन ले लिया औऱ पूछा- हरि ? सब ठीक है न ?

हरि ने हकलाते हए बोला -- "अंकल आप बस जल्द आ जाइये"

"तुम कुछ बताते क्यों नहीं ?"-- देवदत्त हरि को लगभग डांटते हुए बोला।

हरि ने फ़ोन फिर कामिनी के हाथ में दे दिया ।

अब कामिनी ने फ़ोन लेकर कहा - बाबूजी आप कहाँ है ? जहां भी हैं सीधे चंगाराम अस्पताल पहुंच जाइये ।

देवदत्त को कामिनी के जोर-जोर से रोने की आवाजें आने लगी औऱ फ़ोन फिर बंद हो गया ।

देवदत्त ने टैक्सी ड्राइवर को बोला गाड़ी सीधे चंगाराम राम अस्पताल ले चलो जल्दी ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'

◆◆◆◆◆
क्रमश:
भाग-10
Coming soon


बैडरूम -(भाग-8)

 



           ★★शुरू से अभी-तक"★★

            राजेश और कामिनी अपने माता पिता, देवदत्त और सुहासिनी को अपनी कोठी में शिफ्ट होने हेतु एक दिन पहले उन्हें दिखाने के लिए ले जाते हैं । पिता देवदत्त को अच्छा नही लगता क्योंकि सारी कोठी में उन्हें अपने लिए कोई बैडरूम दिखाई नहीं देता  । राजेश औऱ  कामिनी मार्केट में सामान लेने गए होते हैं तो देवदत्त और  सुहासिनी दादी कृष्णा दत्त  के बीमार होने का बहाना बनाकर वहां से लुधियाना अपने भाई लक्ष्मी दत्त के पास चले जाते हैं ।
वहाँ जाकर उन्हें अपनी  सारी गाथा सुनाते हैं । भाई लक्ष्मीदत्त, देवदत्त को समझाते हैं कि तुम्हें अपने बेटे से बात करनी चाहिए थी । हालांकि भाई लक्ष्मी दत्त बहुत पहले से देवदत्त को लुधियाना  आने के लिए प्रेरित करते रहे थे ।
इधर राजेश और कामिनी दोनों परेशान हो जाते हैं | पोते  पिन्टू को दादू देवदत्त से काफी मोह होता है तो वो रो रो कर बेहाल हो जाता है । बार-बार जब राजेश और कामिनी बाबूजी जी को फोन करते हैं तो देवदत्त फोन आफ कर देते हैं ।
देवदत्त औऱ लक्ष्मीदत्त में फिर उनके पिता जी  ईश्वर दत्त  द्वारा जब विल बनाई गई थी उसमें जो देवदत्त को गिले  शिकवे थे उसके बारे में काफी बहस होती है  । लक्ष्मीदत्त ने जोर डाला कि ऊपर वाला पहला तल अब तुम्हारा है बहुत बढ़िया है अगर बेटे से कुछ ऐसा हो  भी जाता है  तो तुम सब यहीं आ जाना । वैसे तुम्हें कोई गलत फहमी भी हो सकती है तुम्हें उस से बात कर के आना चाहिए था, उन्होंने फिर कहा । इसी दुविधा और बात चीत करते करते रात हो जाती है  और दोनों देवदत्त और सुहासिनी पहले तल पर  सोने चले जाते हैं । सुबह-सुबह कामिनी का फोन आता है पिन्टू सीढ़ियों से गिर गया है  उसका सर फट जाता  है । वो कहती है  तुम जल्दी आ जाओ । पिन्टू की खबर सुन देवदत्त बेहोश हो जाता है । शाम की गाड़ी से देवदत्त और कामिनी लुधियाना से दिल्ली की ओर रवाना हो जाते हैं ।
इधर राजेश पिन्टू को अस्पताल ले जाता है । बाद में कामिनी भी घर बंद कर चाबी पडौसी मालती को दे कर अस्पताल चली जाती हैं । पीछे से अमेरिका से राजेश का छोटा भाई मुकेश आ जाता है | पड़ोसन मालती से मिलता है वो उसे बताती है कि वो लोग उसे पिन्टू की बात बताती  हैं |
मुकेश अस्पताल पहुंच जाता है पिंटू आई.सी. यू भरती होता है | | आपरेशन ठीक ठाक हो जाता है मुकेश और कामिनी घर पर आ जाते हैं |
राजेश अस्पताल में ही रुक जाता है | पिता देवदत और माँ सुहासिनी ने सुबह गाडी से दिल्ली पहुंचना होता है |
राजेश सुबह ट्रेन के आने के वक्त के हिसाब से सुबह सात बजे बाबूजी को फोन लगाता है |
बाबूजी फोन उठाते हैं फिर काट देते हैं |

इससे राजेश बहुत परेशान हो जाता है ।

★★★★★★★★★★

अब आगे ------

       घर पर मुकेश और भाभी कामिनी सारी रात बतियाते हुए बहुत देर से सोते हैं तो सुबह नींद बहुत देर से खुलती है |
सुबह के दस बज जाते हैं मुकेश की नींद खुलती है |
वो घडी देखता है दस बज चुके होते हैं |

वो भाभी कामिनी को जा कर उठाता है - "भाभी लेट हो गए हैं जल्दी उठो"

कामिनी हडबडाहट में उठती है |

        घडी देख कर वो भी परेशान हो जाती है  और राजेश की चिंता होने लगती है मुकेश को बोलती है मुकेश भय्या --"क्या भय्या का फ़ोन नहीं आया ?"

"नहीं" मुकेश ने छोटा सा जवाब दिया |

            कामिनी घबरा जाती है मुकेश से  कहती है  -- सुबह  से  इंतज़ार  कर  रहे होंगे  आज बाबू जी ने भी आना था "

ये कहती हुई राजेश को फ़ोन लगाती है | फोन की बेल बजती रहती है | वो उठाता नहीं है ।

  मुकेश और कामिनी अब और परेशान हो जाते हैं |
उनके दिमाग में परेशानी ये की न राजेश ने उसे  फोन  किया  न  ही वो खुद फोन पिक कर रहे हैं |  ये क्या माजरा है ,?

कुछ सोच कर कामिनी बाबू जी को फोन लगाती है |
बाबूजी का फोन स्विच आफ आता  है |

ये सोच कर कि बाबूजी का फोन डिस्चार्ज हुआ हो सकता है तो वो मम्मी का फोन लगाती है |
वो भी स्विच आफ आता है |
अब दोनों और भी ज़्यादा घबरा  जाते हैं |
             जल्दी से तैयार हो बिना कुछ खाए वो अस्पताल पहुँचते हैं |

ऊपर जहां पिंटू का आपरेशन हुआ होता है वहाँ लॉबी में राजेश नहीं होता | अंदर डॉक्टर की खोज करते हैं तो वो अभी आया ही नहीं होता |

कामिनी फिर आस पास और पेशेंट्स के रिश्तेदार होते हैं उनसे पूछती है - " यहाँ जो हमारे बेटे के पिता रात को रुके थे उनका कुछ पता है कहाँ गए हैं ?

उनमें से एक ने कहा -- जो रात को ये वाला कम्बल ले के सोए थे ? ( कम्बल दिखाता हुआ )

कामिनी ने झट से कहा --"हाँ हाँ यही यही"
वो शख्स एक दम से बोला _ मैडम वो तो सुबह जब जमादार आया तो उसने बताया कि कोई आदमी यहाँ बेहोश पड़ा है ? तो उसे इमरजेंसी वार्ड में ले गये थे वहीँ जा कर पता कीजिये |

कामिनी पर तो जैसे पहाड़ टूट पडा | वो दोनों भागते हुए इमरजेंसी वार्ड की और दौड़े |

हर्ष महाजन 'हर्ष'
◆◆◆◆◆

क्रमश:

भाग-9
Coming soon

बैडरूम-(भाग-7)

 





         
                     ●अभी तक●

               राजेश औऱ कामिनी पिन्टू के साथ जब मार्केट से देर से लौटते हैं तो अंधेरा हो चुका होता है ।  नई कोठी में राजेश औऱ कामिनी परेशान हो जाते हैं । राजेश अंदर जाकर पहले सभी लाइटें जलाता है । फिर दोनों अंदर देखते हैं कि तो बाबूजी औऱ माँ सुहासिनी भी घर में नहीं हैं । ये देख दोनों औऱ ज़्यादा परेशान हो जाते हैं । पिन्टू भी दादू-दादू करता इधर-उधर देखने को दौड़ता है औऱ देखते-देखते जब नहीं मिलते तो वो रोने लगता है ।
                      राजेश को कुछ सूझता ही नहीं कभी बाहर तो कभी अंदर । फिर सामने वाले घर की छत से कोई बताता है कि दो बुज़ुर्ग परेशान से लग रहे थे इस घर के आगे से ऑटो पर कहीं निकले हैं ।

कामिनी फिर राजेश को बोलती है कि बाबू जी को फ़ोन लगाओ ?

               पर कई बार फोन लगाया जो मिलता नहीं है । इतने में बाबू जी का फ़ोन ख़ुद से आ जाता है ।

    वो राजेश को बताते हैं कि ताऊ जी का फ़ोन आया था लुधियाना से । 

                      दादी कृश्णा दत्त की तबियत अचानक खराब हो जाती है उन्हें अस्पताल दाखिल कराया है ।

          इसलिए वो लुधियाना जा रहे हैं । राजेश ने लुधियाना ताऊ जी को फ़ोन लगाकर खुद भी आने की बात पूछी तो उन्होंने मना कर दिया ।

★★★★★★★★■★★★★★★★★

अब आगे:-

   राजेश निढाल हो, अंदर पलंग पर लेट जाता है । कामिनी पिन्टू को चुप कराने में लग जाती है ।

लेटे-लेटे राजेश ने कामिनी को बोला-- "कामिनी ?"

"हूँ "-- कामिनी भी अनमनी सी बोलती है ।

"किस्मत  कितनी खराब है हमारी---जो दिन हमने यहां आने के लिए चुना उसी दिन ये सब होना था ?"-- राजेश लगभग भरी सी आवाज में बोला ।

                 "हाँ -- ऊपर वाले के आगे तो कोई भी नहीं है न "---कामिनी अनमनी सी बोली और आगे कहा - "लेकिन बाकि सब तो ठीक है लेकिन, बाबूजी !! अचानक, बिना बताए ही चले गए?
थोड़ा सा रुक भी तो सकते थे"

राजेश ने बीच में ही टोकते औऱ खिसियाते हुए कहा-- "बाबूजी का तो तुम्हें पता ही है । वो किसी भी काम में एक पल भी इंतज़ार नही करते । उनका स्वभाव ही ऐसा है ।"

                      "पर कामिनी इस नई कोठी से भी अब मेरा मन खट्टा हो गया है, महूर्त ही सही नहीं निकला ।" -- राजेश ने ढीली आवाज़ में कहा ।

           "ये क्या कहे जा रहे हो आप"--खून पसीने की कमाई लगी है इस पर ।"---- थोडी गुस्से में पर लाडले अंदाज़ में कामिनी ने कहा ।

        "हाँ ये तो है ।"--राजेश ने कहा -
"बहुत थक गया हूँ ।"

"अब तुम खड़े हो जाओ घर वापिस चलना है अंधेरा औऱ बढ़ जाएगा और ट्रैफिक भी फिर ज़ियादा हो जाएगा ।"---कामिनी एक ही सांस में ये सब कह गयी ।

राजेश बोला -- "आज रहने दो, सुबह चलेंगे । हिम्मत भी नही है और अब मूड भी नहीं है ।"

कामिनी की गोद में पिन्टू अब तक रो-रो कर सो चुका था ।

           कामिनी ने उसे गोद से उतार कर पलंग पर सुला दिया और बोली---"खाने का क्या करोगे ?
भूखे ही रहोगे क्या?

       "मेरे बस की तो नहीं है दुबारा अब बाज़ार जाकर सामान लाया जाए ?"--कामिनी असहाय सी बोली ।

राजेश ने कहा ---मुझे भूख तो वैसे भी नही है ये जो खाने का सामान ले कर आये है ना, इसी में से कुछ कोल्ड ड्रिंक के साथ खा पी लेते हैं"

"औऱ ये पिन्टू?? -- आधी रात को जो उठ के मांगेगा  ?"-- कामिनी भिन्नाई ।

" तो इसका मतलब , मार्केट जाना ही पड़ेगा ?  फिर ऐसा करते है घर ही चलते हैं" -- राजेश ने सलाह दी ।

"नहीं अब मूड बदल गया है यहीं पड़ौस से किसी से दूध का पैकेट पूछती हूँ मिल जाये तो" --  कामिनी बोली औऱ उठ कर बाहर चली गयी ।

दूध लाकर गर्म किया और पिन्टू को उठा कर नींद में ही थोड़ा-थोड़ा कर पिला दिया ।

दोनों ने भी उस सामान में से थोड़ा बहुत खाया और सो गए ।

        सुबह जल्दी उठ वो कोठी से विकास पुरी के लिए निकल लिए ।

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                ●   पिन्टू बेहोश   ●

        विकास पूरी पहुंचते ही राजेश ने दरवाजा खोला और सीधे बाथरूम गया फ्रेश होने के लिए । कामिनी ने सामान उठाकर अंदर रक्खा ।

पिन्टू दादू-दादू बोलता हुआ,  यहाँ भी हर कमरे में ढूँढने लगा । कहीं न मिलने पर वो फिर रोने लगा ।
रोते-रोते वो ऊपर छत पे गया ।

        उसे पता था दादू रोज इस वक़्त  छत पर पौधों को पानी देने जाते हैं । कामिनी ने जानते हुए भी पिन्टू को बाबूजी के बारे में कुछ नहीं बताया कि वो परेशान न करे ।

इतने में सीढ़ियों से धड़-धड़-धड़ कोई चीज़ गिरने की आवाज़ के साथ पिन्टू की चीख की आवाज सुनाई दी और उसी पल सब शांत हो गया ।

राजेश बाथरूम में था कामिनी तो ऐसे हो गयी जैसे काटो तो खून नहीं ।

       कामिनी ने जोर से  बाथरूम का दरवाजा खटखटाते हुए बोलती जा रही थी --"पिन्टू -- वो --पिन्टू गिर गया । सर फट गया उसका जल्दी निकलो-"-कामिनी चिल्लाती जा रही थी ।

      चीखना चिल्लाना इतना जोर जोर से हुआ कि पडौसी इकट्ठा हो गये ।

इतने में राजेश बाहर आया और ये सब देख सुन फटाफट तैयार हो उसने गाड़ी स्टार्ट की ।

        पडौसी, हरि ने पिन्टू को उठाया और चंगाराम अस्पताल के लिए निकल पड़े ।

इधर कामिनी ने सीधे बाबूजी को फोन मिलाया लेकिन उनका फोन लग नही रहा था ।

कामिनी ने फिर ताऊजी का फोन मिलाया । फोन मिल रहा था पर कोई पिक नहीं कर रहा था ।

कुछ देर बाद फ़ोन उठा तो बाबू जी ने ही उठाया ।
कामिनी ने रोते-रोते बताया पिन्टू आपको ढूंढता ढूंढता  सीढ़ियों से गिर गया बाबूजी । जल्दी आ जाओ वो बोलती जा रही थी ।

उधर बाबूजी पिन्टू की बात सुन बेहोश हो गये तो लक्ष्मी ताऊजी  ने फोन ले कर बात की ।

कामिनी ने जब बदली आवाज सुनी तो पूछा --"बाबूजी कहां गए । वो ठीक तो हैं ना ?"

             लक्ष्मीदत्त ताऊ जी ने कहा-- "नहीं वो ठीक हैं वापिसी की तैयारी कर रहे हैं  तू चिंता न कर जल्दी पहुँच जाएंगे तुम पिन्टू का तब तक अस्पताल में इंतजाम करो।"

इतने में फोन डिस्कनेक्ट हो गया ।

           फोन रख कामिनी कुछ ज़रूरी सामान लेकर घर को ताला लगा चाबी पड़ौस में मालती आँटी को दे वो अस्पताल को चल दी ।

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      ● पिन्टू औऱ ऑपेरशन थियेटर ●

         राजेश ने अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड के आगे गाड़ी रोकी । तीन मेल नर्स फटाफट बेहोश पिन्टू को अंदर ले गए । डॉक्टरों की टीम ने उसे चेक कर सीधे ऑपरेशन थियेटर के लिए ले गए ।

                थोड़ी देर में अंदर से डाक्टर ने एक स्लिप बाहर भेजी औऱ एक संदेसा ये कि ब्लड का इंतज़ाम जितनी जल्दी होगा ऑपरेशन उतनी जल्दी शुरू होगा ।

        हरि ने देखा --उस स्लिप में कुछ दवाईयां औऱ चार बोतल ब्लड लाने को कहा गया है ।

हरि ने राजेश को स्लिप दिखाई और दवाइयाँ लेने चला गया ।

राजेश परेशान इधर-उधर अपने दोस्तों को ब्लड के लिए फोन घुमाने लगा पर कहीं से कोई रेस्पॉन्स नहीं मिल पा रहा था ।

राजेश अब घबराकर अस्पताल के बाहर आ गया । बाहर उसने कामिनी को ऑटो से उतरते देखा तो उसके दिल को थोड़ी राहत मिली ।

राजेश ने कामिनी को सारी बात बताई ।

कामिनी ने सारी स्तिथि को भांपते हुए राजेश को ढांढस बंधाया औऱ बोली -- "आप चिंता न करें सब ठीक हो जाएगा ।"

स्तिथि को संभालते हुए उसने समझदारी से काम लिया ।

कामिनी के इतना कहने भर से ही राजेश को थोड़ी होशियारी सी महसूस हुई ।

"चलो अंदर चलते हैं"---कामिनी फिर बोली ।

इतने में हरि भी दवाइयाँ लेकर पहुँच गया । तीनों फिर ऊपर गए ।
ऊपर जाते ही कामिनी ने डॉक्टर  को दवाइयाँ दीं ।

डाक्टर ने फ़िर पूछा -- "ब्लड का इंतजाम हो गया क्या?"

कामिनी बोली - "डाक्टर साहब हम कहाँ जाएँ ब्लड लेने ?"

डाक्टर ने अब साफ-साफ शब्दों में कह दिया - "मैडम बच्चे का बहुत खून बह चुका है ये न हो बच्चा~~~~~"

कहता हुआ डॉक्टर अंदर चला गया ।

राजेश को तीन महीने पहले जॉन्डिस हुआ था इसलिये वो ब्लड दे नहीं सकता था ।

कामिनी ने अस्पताल के ब्लड बैंक जाकर डॉक्टर की पर्ची के अनुसार  खुद अपना ब्लड दिया और डाक्टर को आकर बता दिया ।

डॉक्टर ने बोला - "मैं ऑपेरशन शुरू कर रहा हूँ। एक बोतल जैसे ही खत्म होगी तो उसके बाद के लिए इंतज़ाम कर के रखना ।
नहीं तो ऑपेरशन में मुश्किल हो सकती है ।"

अब तीन बोतल ब्लड का औऱ इंतज़ाम करना था ।

राजेश वहॉं अस्पताल के बाहर लोगों से अपने बच्चे के लिए  ब्लड देने की अपील कर रहा था ।
एक आदमी अभी-अभी ऑटो से उतर उसे पेमेंट कर रहा था । राजेश जल्दी से पेमेंट करते हुए शख्स से ब्लड के लिए अपील करने लगा ।

वो शख्स जैसे ही मुड़ा --राजेश हैरान हो कर उसे देखने लगा औऱ बरबस ही मुँह से निकल गया---- "मुक्की तुम !! ~~~~ यहाँ कैसे??"

मुकेश ने बोला -- "सब बातें छोड़ो पहले ये बताओ ब्लड कहाँ देना है ?

राजेश हैरान होकर उसे देखने लगा और सोचने लगा उसे ये सब कैसे मालूम हुआ ? आँखें नम हो गईं ।

ये देख मुकेश बोला--"घबराओ नहीं भैया सब ठीक हो जाएगा ।"

साथ में एक दोस्त भी था - "इसे पहचाना भैया?" -- उस शख्स की तरफ इशारा करता हुआ मुकेश बोला ।

राजेश ने उसकी तरफ देख पहचानते हुए बोला -- "ओ हो ये वो योगेश, जो रफी के गाने गाता था । वही है न ?"

ये सुन योगेश भी नमस्कार भाई साहब कहता हुआ हँस पड़ा ।

दोनों ने अंदर जाकर ब्लड दिया ।

ऑपेरशन दो घंटे चला

       " डाक्टर ने बताया सब ठीक हो गया है पांच-पांच टाँके दो जगह लगे हैं बच्चा खतरे से बाहर है"  --- डॉक्टर ने बाहर आकर खुशी-खुशी बताया ।

               कामिनी ने राजेश को बताया कि माँ का दो बार फोन आ चुका है । राजधानी में बैठे हैं सुबह पहुंचेंगे ।

           राजेश ने अपने मन की बात कामिनी को बताई -- "कामिनी एक बात बार-बार मन में खटक रही है ।"

कामिनी ने झट से पूछा - "क्या?"

"बाबूजी जब से गये हैं, उन्होंने एक बार भी ख़ुद मुझसे बात नही की ?" -- राजेश के स्वर में दर्द झलक रहा था ।

रुक कर फिर बोला - "हमसे कुछ भूल तो नहीं हो गयी या हमारी तरफ से कोई बात उन्हें बुरी तो नहीं लगी ?"

"अब ये तो वो ही बता सकते हैं"-- कामिनी ने भी दो टूक जवाब देते हुए कहा ।

रात को राजेश अस्पताल में रुक गया । हरि तीनों को ले घर चला गया ।

देवर भाभी की सारी रात एक दूसरे की ख़ैर पूछते औऱ बतियाते निकली ।

अस्पताल में राजेश की रात भी आँखों-आंखों में निकल गयी ।

राजेश ने घड़ी देखी--- सुबह के सात बज चुके थे ।

सोचा ट्रेन आ चुकी होगी ।

ये सोच बाबूजी को फ़ोन लगाकर पूछता हूँ कि इस वक़्त वो कहाँ पहुँचे हैं।

फोन लगाया बाबूजी ने ही उठाया ।

"कहाँ हो बाबूजी ?"-- जैसे ही राजेश ने पूछा ।

उधर से फ़ोन कट गया ।

राजेश ने फिर कई बार फोन कर के देखा -- माँ और बाबूजी दोनों का फ़ोन अब स्विच ऑफ आने लगा था ।

उसे कुछ झटका सा महसूस हुआ फ़ोन बंद होने के बाद भी कान से लगा का लगा  ही रह गया ।

---हर्ष महाजन
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क्रमश:

भाग-8
Coming soon





         
                     ●अभी तक●

               राजेश औऱ कामिनी पिन्टू के साथ जब मार्केट से देर से लौटते हैं तो अंधेरा हो चुका होता है ।  नई कोठी में राजेश औऱ कामिनी परेशान हो जाते हैं । राजेश अंदर जाकर पहले सभी लाइटें जलाता है । फिर दोनों अंदर देखते हैं कि तो बाबूजी औऱ माँ सुहासिनी भी घर में नहीं हैं । ये देख दोनों औऱ ज़्यादा परेशान हो जाते हैं । पिन्टू भी दादू-दादू करता इधर-उधर देखने को दौड़ता है औऱ देखते-देखते जब नहीं मिलते तो वो रोने लगता है ।
                      राजेश को कुछ सूझता ही नहीं कभी बाहर तो कभी अंदर । फिर सामने वाले घर की छत से कोई बताता है कि दो बुज़ुर्ग परेशान से लग रहे थे इस घर के आगे से ऑटो पर कहीं निकले हैं ।

कामिनी फिर राजेश को बोलती है कि बाबू जी को फ़ोन लगाओ ?

               पर कई बार फोन लगाया जो मिलता नहीं है । इतने में बाबू जी का फ़ोन ख़ुद से आ जाता है ।

    वो राजेश को बताते हैं कि ताऊ जी का फ़ोन आया था लुधियाना से । 

                      दादी कृश्णा दत्त की तबियत अचानक खराब हो जाती है उन्हें अस्पताल दाखिल कराया है ।

          इसलिए वो लुधियाना जा रहे हैं । राजेश ने लुधियाना ताऊ जी को फ़ोन लगाकर खुद भी आने की बात पूछी तो उन्होंने मना कर दिया ।

★★★★★★★★■★★★★★★★★

अब आगे:-

   राजेश निढाल हो, अंदर पलंग पर लेट जाता है । कामिनी पिन्टू को चुप कराने में लग जाती है ।

लेटे-लेटे राजेश ने कामिनी को बोला-- "कामिनी ?"

"हूँ "-- कामिनी भी अनमनी सी बोलती है ।

"किस्मत  कितनी खराब है हमारी---जो दिन हमने यहां आने के लिए चुना उसी दिन ये सब होना था ?"-- राजेश लगभग भरी सी आवाज में बोला ।

                 "हाँ -- ऊपर वाले के आगे तो कोई भी नहीं है न "---कामिनी अनमनी सी बोली और आगे कहा - "लेकिन बाकि सब तो ठीक है लेकिन, बाबूजी !! अचानक, बिना बताए ही चले गए?
थोड़ा सा रुक भी तो सकते थे"

राजेश ने बीच में ही टोकते औऱ खिसियाते हुए कहा-- "बाबूजी का तो तुम्हें पता ही है । वो किसी भी काम में एक पल भी इंतज़ार नही करते । उनका स्वभाव ही ऐसा है ।"

                      "पर कामिनी इस नई कोठी से भी अब मेरा मन खट्टा हो गया है, महूर्त ही सही नहीं निकला ।" -- राजेश ने ढीली आवाज़ में कहा ।

           "ये क्या कहे जा रहे हो आप"--खून पसीने की कमाई लगी है इस पर ।"---- थोडी गुस्से में पर लाडले अंदाज़ में कामिनी ने कहा ।

        "हाँ ये तो है ।"--राजेश ने कहा -
"बहुत थक गया हूँ ।"

"अब तुम खड़े हो जाओ घर वापिस चलना है अंधेरा औऱ बढ़ जाएगा और ट्रैफिक भी फिर ज़ियादा हो जाएगा ।"---कामिनी एक ही सांस में ये सब कह गयी ।

राजेश बोला -- "आज रहने दो, सुबह चलेंगे । हिम्मत भी नही है और अब मूड भी नहीं है ।"

कामिनी की गोद में पिन्टू अब तक रो-रो कर सो चुका था ।

           कामिनी ने उसे गोद से उतार कर पलंग पर सुला दिया और बोली---"खाने का क्या करोगे ?
भूखे ही रहोगे क्या?

       "मेरे बस की तो नहीं है दुबारा अब बाज़ार जाकर सामान लाया जाए ?"--कामिनी असहाय सी बोली ।

राजेश ने कहा ---मुझे भूख तो वैसे भी नही है ये जो खाने का सामान ले कर आये है ना, इसी में से कुछ कोल्ड ड्रिंक के साथ खा पी लेते हैं"

"औऱ ये पिन्टू?? -- आधी रात को जो उठ के मांगेगा  ?"-- कामिनी भिन्नाई ।

" तो इसका मतलब , मार्केट जाना ही पड़ेगा ?  फिर ऐसा करते है घर ही चलते हैं" -- राजेश ने सलाह दी ।

"नहीं अब मूड बदल गया है यहीं पड़ौस से किसी से दूध का पैकेट पूछती हूँ मिल जाये तो" --  कामिनी बोली औऱ उठ कर बाहर चली गयी ।

दूध लाकर गर्म किया और पिन्टू को उठा कर नींद में ही थोड़ा-थोड़ा कर पिला दिया ।

दोनों ने भी उस सामान में से थोड़ा बहुत खाया और सो गए ।

        सुबह जल्दी उठ वो कोठी से विकास पुरी के लिए निकल लिए ।

★★★★★★★★★★★★★★★★★

                ●   पिन्टू बेहोश   ●

        विकास पूरी पहुंचते ही राजेश ने दरवाजा खोला और सीधे बाथरूम गया फ्रेश होने के लिए । कामिनी ने सामान उठाकर अंदर रक्खा ।

पिन्टू दादू-दादू बोलता हुआ,  यहाँ भी हर कमरे में ढूँढने लगा । कहीं न मिलने पर वो फिर रोने लगा ।
रोते-रोते वो ऊपर छत पे गया ।

        उसे पता था दादू रोज इस वक़्त  छत पर पौधों को पानी देने जाते हैं । कामिनी ने जानते हुए भी पिन्टू को बाबूजी के बारे में कुछ नहीं बताया कि वो परेशान न करे ।

इतने में सीढ़ियों से धड़-धड़-धड़ कोई चीज़ गिरने की आवाज़ के साथ पिन्टू की चीख की आवाज सुनाई दी और उसी पल सब शांत हो गया ।

राजेश बाथरूम में था कामिनी तो ऐसे हो गयी जैसे काटो तो खून नहीं ।

       कामिनी ने जोर से  बाथरूम का दरवाजा खटखटाते हुए बोलती जा रही थी --"पिन्टू -- वो --पिन्टू गिर गया । सर फट गया उसका जल्दी निकलो-"-कामिनी चिल्लाती जा रही थी ।

      चीखना चिल्लाना इतना जोर जोर से हुआ कि पडौसी इकट्ठा हो गये ।

इतने में राजेश बाहर आया और ये सब देख सुन फटाफट तैयार हो उसने गाड़ी स्टार्ट की ।

        पडौसी, हरि ने पिन्टू को उठाया और चंगाराम अस्पताल के लिए निकल पड़े ।

इधर कामिनी ने सीधे बाबूजी को फोन मिलाया लेकिन उनका फोन लग नही रहा था ।

कामिनी ने फिर ताऊजी का फोन मिलाया । फोन मिल रहा था पर कोई पिक नहीं कर रहा था ।

कुछ देर बाद फ़ोन उठा तो बाबू जी ने ही उठाया ।
कामिनी ने रोते-रोते बताया पिन्टू आपको ढूंढता ढूंढता  सीढ़ियों से गिर गया बाबूजी । जल्दी आ जाओ वो बोलती जा रही थी ।

उधर बाबूजी पिन्टू की बात सुन बेहोश हो गये तो लक्ष्मी ताऊजी  ने फोन ले कर बात की ।

कामिनी ने जब बदली आवाज सुनी तो पूछा --"बाबूजी कहां गए । वो ठीक तो हैं ना ?"

             लक्ष्मीदत्त ताऊ जी ने कहा-- "नहीं वो ठीक हैं वापिसी की तैयारी कर रहे हैं  तू चिंता न कर जल्दी पहुँच जाएंगे तुम पिन्टू का तब तक अस्पताल में इंतजाम करो।"

इतने में फोन डिस्कनेक्ट हो गया ।

           फोन रख कामिनी कुछ ज़रूरी सामान लेकर घर को ताला लगा चाबी पड़ौस में मालती आँटी को दे वो अस्पताल को चल दी ।

★★★★★★★★★★★★★★★★★

      ● पिन्टू औऱ ऑपेरशन थियेटर ●

         राजेश ने अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड के आगे गाड़ी रोकी । तीन मेल नर्स फटाफट बेहोश पिन्टू को अंदर ले गए । डॉक्टरों की टीम ने उसे चेक कर सीधे ऑपरेशन थियेटर के लिए ले गए ।

                थोड़ी देर में अंदर से डाक्टर ने एक स्लिप बाहर भेजी औऱ एक संदेसा ये कि ब्लड का इंतज़ाम जितनी जल्दी होगा ऑपरेशन उतनी जल्दी शुरू होगा ।

        हरि ने देखा --उस स्लिप में कुछ दवाईयां औऱ चार बोतल ब्लड लाने को कहा गया है ।

हरि ने राजेश को स्लिप दिखाई और दवाइयाँ लेने चला गया ।

राजेश परेशान इधर-उधर अपने दोस्तों को ब्लड के लिए फोन घुमाने लगा पर कहीं से कोई रेस्पॉन्स नहीं मिल पा रहा था ।

राजेश अब घबराकर अस्पताल के बाहर आ गया । बाहर उसने कामिनी को ऑटो से उतरते देखा तो उसके दिल को थोड़ी राहत मिली ।

राजेश ने कामिनी को सारी बात बताई ।

कामिनी ने सारी स्तिथि को भांपते हुए राजेश को ढांढस बंधाया औऱ बोली -- "आप चिंता न करें सब ठीक हो जाएगा ।"

स्तिथि को संभालते हुए उसने समझदारी से काम लिया ।

कामिनी के इतना कहने भर से ही राजेश को थोड़ी होशियारी सी महसूस हुई ।

"चलो अंदर चलते हैं"---कामिनी फिर बोली ।

इतने में हरि भी दवाइयाँ लेकर पहुँच गया । तीनों फिर ऊपर गए ।
ऊपर जाते ही कामिनी ने डॉक्टर  को दवाइयाँ दीं ।

डाक्टर ने फ़िर पूछा -- "ब्लड का इंतजाम हो गया क्या?"

कामिनी बोली - "डाक्टर साहब हम कहाँ जाएँ ब्लड लेने ?"

डाक्टर ने अब साफ-साफ शब्दों में कह दिया - "मैडम बच्चे का बहुत खून बह चुका है ये न हो बच्चा~~~~~"

कहता हुआ डॉक्टर अंदर चला गया ।

राजेश को तीन महीने पहले जॉन्डिस हुआ था इसलिये वो ब्लड दे नहीं सकता था ।

कामिनी ने अस्पताल के ब्लड बैंक जाकर डॉक्टर की पर्ची के अनुसार  खुद अपना ब्लड दिया और डाक्टर को आकर बता दिया ।

डॉक्टर ने बोला - "मैं ऑपेरशन शुरू कर रहा हूँ। एक बोतल जैसे ही खत्म होगी तो उसके बाद के लिए इंतज़ाम कर के रखना ।
नहीं तो ऑपेरशन में मुश्किल हो सकती है ।"

अब तीन बोतल ब्लड का औऱ इंतज़ाम करना था ।

राजेश वहॉं अस्पताल के बाहर लोगों से अपने बच्चे के लिए  ब्लड देने की अपील कर रहा था ।
एक आदमी अभी-अभी ऑटो से उतर उसे पेमेंट कर रहा था । राजेश जल्दी से पेमेंट करते हुए शख्स से ब्लड के लिए अपील करने लगा ।

वो शख्स जैसे ही मुड़ा --राजेश हैरान हो कर उसे देखने लगा औऱ बरबस ही मुँह से निकल गया---- "मुक्की तुम !! ~~~~ यहाँ कैसे??"

मुकेश ने बोला -- "सब बातें छोड़ो पहले ये बताओ ब्लड कहाँ देना है ?

राजेश हैरान होकर उसे देखने लगा और सोचने लगा उसे ये सब कैसे मालूम हुआ ? आँखें नम हो गईं ।

ये देख मुकेश बोला--"घबराओ नहीं भैया सब ठीक हो जाएगा ।"

साथ में एक दोस्त भी था - "इसे पहचाना भैया?" -- उस शख्स की तरफ इशारा करता हुआ मुकेश बोला ।

राजेश ने उसकी तरफ देख पहचानते हुए बोला -- "ओ हो ये वो योगेश, जो रफी के गाने गाता था । वही है न ?"

ये सुन योगेश भी नमस्कार भाई साहब कहता हुआ हँस पड़ा ।

दोनों ने अंदर जाकर ब्लड दिया ।

ऑपेरशन दो घंटे चला

       " डाक्टर ने बताया सब ठीक हो गया है पांच-पांच टाँके दो जगह लगे हैं बच्चा खतरे से बाहर है"  --- डॉक्टर ने बाहर आकर खुशी-खुशी बताया ।

               कामिनी ने राजेश को बताया कि माँ का दो बार फोन आ चुका है । राजधानी में बैठे हैं सुबह पहुंचेंगे ।

           राजेश ने अपने मन की बात कामिनी को बताई -- "कामिनी एक बात बार-बार मन में खटक रही है ।"

कामिनी ने झट से पूछा - "क्या?"

"बाबूजी जब से गये हैं, उन्होंने एक बार भी ख़ुद मुझसे बात नही की ?" -- राजेश के स्वर में दर्द झलक रहा था ।

रुक कर फिर बोला - "हमसे कुछ भूल तो नहीं हो गयी या हमारी तरफ से कोई बात उन्हें बुरी तो नहीं लगी ?"

"अब ये तो वो ही बता सकते हैं"-- कामिनी ने भी दो टूक जवाब देते हुए कहा ।

रात को राजेश अस्पताल में रुक गया । हरि तीनों को ले घर चला गया ।

देवर भाभी की सारी रात एक दूसरे की ख़ैर पूछते औऱ बतियाते निकली ।

अस्पताल में राजेश की रात भी आँखों-आंखों में निकल गयी ।

राजेश ने घड़ी देखी--- सुबह के सात बज चुके थे ।

सोचा ट्रेन आ चुकी होगी ।

ये सोच बाबूजी को फ़ोन लगाकर पूछता हूँ कि इस वक़्त वो कहाँ पहुँचे हैं।

फोन लगाया बाबूजी ने ही उठाया ।

"कहाँ हो बाबूजी ?"-- जैसे ही राजेश ने पूछा ।

उधर से फ़ोन कट गया ।

राजेश ने फिर कई बार फोन कर के देखा -- माँ और बाबूजी दोनों का फ़ोन अब स्विच ऑफ आने लगा था ।

उसे कुछ झटका सा महसूस हुआ फ़ोन बंद होने के बाद भी कान से लगा का लगा  ही रह गया ।

---हर्ष महाजन
◆◆◆◆◆
क्रमश:

भाग-8
Coming soon

Sunday, July 4, 2021

बैडरूम-(भाग-6)

 

:कास्ट:
देवदत्त के रिश्तों के अनुसार

दादा/दादी
छुटमल दत्त/मालती दत्त

बाऊजी(पिता जी) = ईश्वर दत्त
माता जी =  कृश्णा देवी दत्त

तीन भाई:
प्रताप दत्त/लक्ष्मी दत्त/देवदत्त
राधा/,कमला/सन्तोष
*****
प्रताप दत्त/तूलिका दत्त
इनके बच्चे
भूषण/रिया/टिया/दिया

लक्ष्मीदत्त/कोटिलया
इनके बच्चे और उनकी पत्नी
1 सुधीर/देविका
2 कबीर/रीना
3 कृतिका

देवदत्त/सुहासिनी

इनके बच्चे
1) राजेश/कामिनी/पिंटू
2) मुकेश दत्त/एकता/अभि/अकेली
3)लेता
प्रिया -- नॉकरानी
★★★★★★★★★★★★★★★★

देवदत्त को जब होश आया तो उन्होंने अपने को पलंग पर लेटा पाया ।

डाक्टर साहब उनके पास खड़े हो हिदायतें बता रहे थे । चेक- अप कर उन्होंने बताया कि वो अब बिल्कुल ठीक हैं । थोड़ा स्ट्रेस ज़्यादा होने की वजह से ऐसा हुआ है । दवाई मैनें लिख दी है दिन में तीन बार देनी है । अगर फिर छाती में दर्द महसूस हो तो ये गैस की गोली है फिर से दे देना ।

लक्ष्मीदत्त ने डॉक्टर से पूछा कि क्या ये दिल्ली ट्रैवेल कर सकते हैं ?

"हाँ हाँ क्यों नहीं, कुछ नहीं है इन्हें " -- जा सकते हैं बिना कोई चिंता किये ।

           अभी तक सभी लोग कमरे में बैचेन से बैठे थे । सुहासिनी बहुत परेशान थी । देवदत्त के बेहोश होते ही लक्ष्मी दत्त ने उनके हाथ से फ़ोन लिया और कामिनी से बात की ।

कामिनी ने बताया--- "कि पिन्टू, दादू को बहुत याद कर रहा था ।"

रुक कर फिर बोली---
"बस इसी भागा दौड़ी में वो सीढ़ियों से गिर गया है । राजेश उसे अस्पताल ले गए हैं अब मैं भी जा रही हूँ । पर ताऊ जी--बाबू जी को बात करते करते क्या हुआ??"

लक्ष्मी दत्त ने बात को टालते हुए कहा कुछ नही हुआ कुछ नही हुआ । लो माँ से बात करो-- कहते हुए सुहासिनी को फ़ोन दे दिया ।

सुहासिनी ने कामिनी से बात की औऱ तसल्ली देते हुए कहा --- "तुम जल्द अस्पताल जाओ और बताओ कि उसका क्या हाल है ?"

  "तेरे बाबूजी अभी ठीक नही लग रहे हम जल्द वापिस आने की तैयारी करते हैं ।"

"क्या हुआ बाबू जी को?"---कामिनी ने चिंता जताई

लक्ष्मीदत्त ने अपने एजेंट से शाम की गाड़ी से वापिसी की टिकट बुक करवा दी ।
★★★★★★★★★

      गाड़ी चल पड़ी । दोनों सीट नीचे की थीं इसलिए आमने-सामने बैठ कर उनका सफ़र शुरू हुआ । घर जाने के नाम पर देवदत्त फिर ग़मगीन हो होने लगे ।

सुहासिनी ने कामिनी को फोन लगाया और पिन्टू का हाल पूछा तो उसने कहा -- 'मम्मी पाँच टाँके लगे हैं । कल ये लोग हमें छुट्टी दे देंगे ।"

इतना सुन देवदत्त को भी तसल्ली हुई ।

इतने में गाड़ी में चाय वाला आया, उससे दो कप चाय लेकर दोनों धीरे-धीरे पीने लगे ।

दोनों में कोई ख़ास बातचीत नहीं हो रही थी ।

चाय पीते-पीते सुहासिनी ने देवदत्त से न चाहते हुए भी पूछ ही लिया  ।

"अजी आप कुछ बता रहे थे  प्रताप भाई साहब औऱ लक्ष्मी भाई साहब में क्या कुछ  हुआ था  ? कि वो घर ही छोड़ के चले गए ।"

देवदत्त के चेहरे पर फिर से पीड़ा के भाव साफ़-साफ़ पढ़े जा सकते थे ।

सुहासिनी इस बात को महसूस कर रही थी ।

सीधे बैठ देवदत्त ने सुहासिनी को बताना शुरू किया ।
*****************
बुढापा इतना तंग नहीं करता सुहासिनी जितना ओलाद का रवैया ।

यही सब की वजह से हमारा इतना बड़ा परिवार बिखर गया ।

हमारे दादा छुटमल दत्त और दादी मालती दत्त पँजाब के जाने माने कारोबारी थे ।

ये सुन सुहासिनी बीच में ही बोल उठी --- क्या दादी भी ?

हाँ दादी मालती दत्त ही तो थी जिसने पाकिस्तान से उजड़ कर आये सारे ख़ानदान को अपने शातिर दिमाग़ से दुबारा खड़ा कर दिया था ।

वो अपने मायके से ही ये हुनर साथ लेकर लायी थी और सारे खानदान में उसका बड़ा दबदबा था ।

अपने चारों भाइयों में हमारे दादा जी सबसे छोटे थे ।
लेकिन चारों भाइयों में सुर एक ही था । सबका एक दूसरे के बिना एक पल भी नहीं गयज़रता था ।

अगर कुछ छूट पुट होती भी थी तो शाम तलक सब नार्मल हो ही जाते थे ।
उनमें
1) सबसे बड़े गैंडामल दत्त
2) उनसे छोटे छज्जुमल दत्त
3) तीसरे नंबर पर टूडूमल दत्त
4) चौथे पर हमारे दादा जी छुटमल दत्त

औऱ दादा छुटमल दत्त यानि हमारे दादा जी की आगे की चार संताने थी ।

एक हमारे बाऊजी (ईश्वर दत्त) औऱ
तीन प्यारी सी बहिनें-- लाजवंती/प्रकाशी औऱ गुणवंती ।

           ऐसे नाम सुन सुहासिनी  मुँह बनाती हुई बोली ---"ये कैसे नाम हुए भला ?"

             देवदत्त मुस्कुराते हुए बोले-- "पहले ऐसे ही नाम हुआ करते थे ।"
 
       फ़िर आगे कहते हुए देवदत्त बोले  -- "दादी मालती दत्त के  एक ही इशारे पर  बाज़ार बंद हो जाता था औऱ एक ही इशारे पर बाज़ार खुल जाता था ।"

"ऐसा ????"---- सुहासिनी आश्चर्य चकित हुई ।

हाँ में सर हिलाते हुए देवदत्त फिर बोले--- "ऐसा ही बाऊजी बताते थे।"

पाकिस्तान से आने के बाद मालती इंडस्ट्रीज के कारोबार को फ़िर एक झटका तब लगा ।

जब दादी मालती को अचानक दिल का दौरा पड़ा और एक ही झटके में वो चल बसीं ।

चारो भाइयों में मन मुटाव हो, उससे पहले ही हमारे दादू छुटमल दत्त ने मालती इंडस्ट्रीज की सारी  यूनिट्स को बराबर बराबर बांट देने की बात की ।

ये आइडिया हमारे बड़े भाई साहब प्रताप जी का था । काम पढ़े लिखे कारोबार की अंदर तक समझ थी उन्हें ।

उन दिनों लक्ष्मी भाई साहब को इन बातों की समझ नहीं थी । वो माँ कृश्णा का लाडला था ।

हालाँकि इसे बाँटने की बात पर दादाजी  बाकि कोई भाई राज़ी नहीं था ।

लेकिन हमारे बड़े भाई साहब प्रताप दत्त का दिमाग़ पूरा अपनी दादी के दिमाग़ जैसा ही शातिर था । पूरा कारोबारी । कारोबार की एक-एक चीज़ दादी के नक्शे कदम पर थी । पर दिल का एकदम नर्म औऱ कागज़ी ।

मुझे तो वो अपना बेटा ही समझते थे । अब तो वी बाहर ही हैं ।

प्रताप दत्त भाई साहब ने ही सबको समझाया कि टैक्स के चलते हमें अब ये कारोबार को अलग-अलग  नाम से करना ही होगा ।

इसके पीछे औऱ भी बहुत महत्वपूर्ण कारण प्रताप ने बाऊजी को बताया था कि आगे आने वाले वक्त में दादा जी के भाइयों के बच्चे भी बड़े हो जाएंगे ।

तब अगर  किसी बात पर झगड़े के चलते अलग हुए तो बहुत दिक्कत होगी ।

अभी तो चार हिस्से होंगे । अगर आगे चल कर हिस्से हुए तो हमारे हिस्से तो कुछ भी नहीं आएगा ।

सबके तीन-तीन लड़के हैं । दो तीन साल बाद वो सभी एक-एक करके हिस्सेदार  बन जायेंगे । टोटल तेहरह हिस्से जाएंगे  ।  उन सबके हिस्से में चार चार हिस्से आएंगे और हमारे हिस्से में सिर्फ एक ।

हमारे दादा जी को ये बात समझ में आ गयी औऱ उन्होंने प्रताप को आगे बढ़ने के लिए बोल दिया ।

ये सारी बातें --- घर आकर वो दादी कृश्णा देवी से ज़रूर शेयर करते थे । लक्ष्मी दत्त दादी के साथ बैठा सब बातें सुना करता था । दादा जी -- दादी के आगे प्रताप के तारीफों के पल बांध दिया करते थे ।

बड़े शातिर तरीके से क़ारोबार के यूनिट्स चार भागों में बाँट कर अलग काट दिए गए और सभी के सामने कागज़ की चार पर्चियाँ बनाई । हर पर्ची में एक एक हिस्सा दर्ज कर दिया औऱ फोल्ड करके एक मटके में डाल दीं ।

फ़िर एक छोटे बच्चे को बुलाकर उसके हाथों  से अलग-अलग नाम बोलकर पर्चियाँ उठवाईं ।

ऐसा करने से सब के मन में कोई द्वेष भाव भी पैदा नहीं हुआ औऱ सारा कारोबार रातों रात चार हिस्सों में बँट गया ।

मगर जिस मोटर पार्ट्स के समूह की पर्ची हमारे दादा जी की निकली वो बहुत ही मुश्किल से मिलने वाली आइटमें थीं ।

मगर बाऊजी को पता था कि प्रताप ये सब संभाल लेगा ।

मगर बाउजी ने ये भी बताया -- कि बाँटना इस लिए ज़रूरी था

कि मालती दादी के बाद कोई इतने रुआब से एक दूसरे को इकट्ठा नहीं रख सकता था ।

हमारे बच्चे भी अब बड़े हो रहे थे ।  इकट्ठा रखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा ही था ।

दादा जी तो वैसे ही नर्म दिल औऱ पूजा पाठ वाले इंसान थे ।

प्रताप का शातिर दिमाग ये जानता  औऱ समझता था कि अब सब भाइयों की उम्मीद  हमारे दादा जी से ही होगी कि वो ही सारा काम देखें ।

मालती  दादी के होते हुए वो तो सब--- बस नाम के ही डायरेक्टर बने हुए थे । सुबह तैयार होकर ऑफिस जाना भर ही उनका काम था ।

जब कारोबार बँट गया तो पता लगा धीरे-धीरे बाद में एक-एक कर वो तीनोँ भाइयों का काम खत्म हो गया था ।

सिर्फ हमारे दादा जी का वक़्त आसमान छू रहा था ।

प्रताप ने चाइना से सभी आइटमों का आयात शुरू कर दिया था ।

बाऊजी, लक्ष्मीदत्त को भी अलग से प्रताप के  वो सारे गुर बताया करते थे । जिसकी वजह से कारोबार आगे बढ़ रहा था औऱ किस तरह प्रताप ने वक़्त रहते कारोबार को चार हिस्से में बाँट दिया ।

कारोबार को अभी एक औऱ झटका लगना बाक़ी था ।

सन 65 की लड़ाई ।

लड़ाई छिड़ने के बाद  हमारा बिज़नेस पूरी तरह ठप हो गया ।

चाइना से सामान आना बंद जो हो गया था।
 
उन दिनों प्रताप भाई साहब और तूलिका भाभी के यहॉं जुड़वा बच्चे पैदा हुए ।

भूषण और रिया ।

हमारे दादा छुटमल दत्त बाऊजी ईश्वर दत्त और भाई साहब प्रताप ने मिलकर फिर कारोबार को मज़बूती से खड़ा कर लिया ।

26 नवंबर सन 1970 का दिन अभी तक मुझे याद है । जब दादा छुटमल दत्त हमें छोड़ कर चले गए ।

मैं उन दिनों बहुत छोटा था । लेकिन उनके जाने पर मैं रोया बहुत था ।

उनके जाने के बाद प्रताप भाई साहब ने लक्ष्मी भाई साहब को भी आफिस जॉइन करवाया ।

अभी तक लक्ष्मी भाई साहब सिर्फ उगाही के लिए ही भेजे जाते थे ।

गाड़ी ने एकदम झटका मारा । शायद कोई स्टेशन आ गया था ।

सुहासिनी ने गाड़ी की खिड़की से बाहर स्टेशन का नाम पढ़ने की कोशिश की --/लेकिन  कुछ खास दिखाई नहीं दे रहा था ।

अंधेरा बढ़ गया था और हमारा डिब्बा स्टेशन से आगे निकल कर खड़ा था ।

इतने में----

गाड़ी में काफी वाले कि आवाज़ जोर जोर से आने लगी । सुहासिनी ने देवदत्त से पूछा-- "आप लोगे काफी?"

हाँ में सर हिला दिया उन्होंने ।

काफी का सिप लेते हुए देवदत्त ने फिर कहना शुरू किया ।

यहीं वक़्त था  लक्ष्मी दत्त ने बाऊजी के कान भरने शुरू किये ।  दबाव में लाने के लिए दादी को भी बात कर कर के पका दिया करता था ।

मुझे पढ़ाई के लिए दबाव डालते रहे थे कि पढ़ लिख के बड़ा अफसर बनना है ।

अब तीनों मिलकर कारोबार आगे बढ़ाने लगे।  लक्ष्मी और कोटिलया भाभी के बच्चे भी बड़े होने लगे ।

बच्चों की वजह से कई बार घर में झगड़े का माहौल भी बनने लगा ।

मुझे भी थोड़ी-थोड़ी समझ आने लगी थी कि वो सब लक्ष्मी भाई साहब की लालची नज़रें काम कर रहीं थीं ।

फिर एक दिन वो हुआ जिसका किसी को कतई भी अंदाज़ा नहीं  था ।

दिवाली का त्यौहार था । हम सब पटाखों में व्यस्त थे । भाई प्रताप कारोबार के सिलसिले में गुजरात गए हुए थे ।

बाऊजी आफिस में कम्पनी के एम्प्लाइज के साथ पूजा करने चले तो लक्ष्मी भाई को उन्होंने जब बोला --- तो बग़ै साहब ने तबियत का बहाना बनाकर जाने से मना कर दिया । बाऊजी को अटपटा तो लगा मगर वो कुछ बोले नहीं ।

भूषण, रिया, सुधीर, कबीर औऱ मैं दीयों, पटाखों औऱ फुलझड़ियों में मज़ा लूटने लगे ।

मैं घर के सामने बड़े बड़े बम फोड़ने में व्यस्त हो गया और बच्चे अपनी मस्ती में कभी ऊपर कभी नींचे भागने में ।

कभी वो लोग मेरे से फुलझड़ी जलवा कर ले जाते तो कभी चकरी लेकर ।

बहुत स्टाक था जलाने को । मैं और सामने घर से कई लोग मिल कर त्यौहार का मज़ा ले रहे थे ।

बमों का इतना शोर था कि कुछ और सुनाई ही नही दे रहा था ।

इतने में सामने वाले छत से किसी ने मेरे ऊपर पानी फेंका ।

मुझे बड़ा गुस्सा आया ।

मैंने गाली निकाल कर ऊपर देखा । वहॉं से एक आँटी चिल्ला रही थी ---" देव देव देव देखो तुम्हारी पहले तल पे आग । जल्दी जाओ ।"

हम सब ऊपर भागे ।

बॉथरूम से आग की लपटें बाहर की तरफ आ रहीं थीं ।

देखा - तो बाथरूम की बाहर से किसी ने कुंडी लगा दी थी ।

देवदत्त कहते कहते सिसकने लगे ।

मुझे इसमें साज़िश की बू आने लगी थी ।

दरवाजे की कुंडी बाहर से किसने लगाई ?

मैंने जब कुंडी खोली -- तो  केरोसीन की भभक तेजी से बाहर आई ।

        पूछने पर किसी को पता न था कि भूषण कब ऊपर आया औऱ कब औऱ कैसे बाथरूम में घुसा ।

औऱ कब~~~~~?

जल्द उसे अस्पताल ले जाया गया ।

"है भगवान" -- सुगासिनी बहुत डरी सहमी सी बोली ।

पुलिस अस्पताल पहुँची तो सबके ब्यान लिए गए ।

अब भूषण के ब्यान की इंतज़ार होने लगी ।

लक्ष्मी भाई साहब का चेहरा पीला पड़ा हुआ था । उसे पता लग चुका था कि भूषण अभी ज़िंदा है ।

             पुलिस कांस्टेबल वहीं तैनात हो गया जैसे ही उसे होश आये तो वो ब्यान के लिए बुला लेंगे ।

आख़िर भूषण को सुबह -- थोड़ा होश आया ।

पुलिस को जो भूषण ने ब्यान दर्ज करवाए उस से सारा परिवार स्तब्ध रह गया ।

उसने लिखवाया लक्ष्मी चाचू ने उसे गिफ्ट देने के लिए ऊपर बुलाया । मुझे गिफ्ट दी । हाथ की घड़ी । जो अस्पताल में डॉक्टर ने उसकी कलाई  से उतार ली थी ।

( पुलिस ने जब्त कर मालखाने में जमा करवा दी थी ।)

भूषण आगे ब्यान दिया:-
उसके बाद उसको सब जगह मोमबत्ती जलाने को कहा ।

जब सभी बनेरों पर मोमबत्ती उसने जला ली  तो चाचू ने दो मोमबत्ती औऱ दी और कहा ये बाथरूम में जला आओ ।

मैं बाथरूम में चला गया । जैसे ही मैं बाथरूम जाकर मोमबत्ती चलाने लगा बाहर से चाचू ने दरवाजा बंद कर दिया । मैन सोचा कि बंद कर के कुछ कर रहे होंगे ।

उसके बाद मैंने देखा  धीरे धीरे मेरे पैर गीले होने लगे हैं और कुछ केरोसीन जैसे बदबू आने लगी । दरवाजे के नीचे से पेट्रोल और केरोसीन अंदर आने लगा था  ।  घबरा कर मेरे हाथ से जलती हुई मोमबत्ती छूट कर नीचे गिर गयी  ।  मोमबत्ती नीचे गिरते ही एकदम चारो तरफ आग ही आग हो गयी ।  

उसके बाद का उसे होश नहीं रहा ।

दो दिन बाद भूषण ने प्राण त्याग दिए ।

सुहासिनी ये सब सुन परेशान हो गयी ।

तूलिका भाभी औऱ माँ रो रो कर बेहाल हो रही थी । घर का होनहार चिराग़ बुझ चुका था । वो प्रताप भाई साहब की तरह ही हुनर मंद था ।

इस सारे प्राकरण में प्रताप भाई साहब एक दम खामोश हो गए ।

उन्हें सब कुछ समझ आ चुका था ।

उनका दिमाग किसी ओर ही धुन में काम कर रहा था ।

सारे मोहल्ले में थू थू होने लगी थी । मालती दादी ने जो ख्याति बनाई थी वो सबको अब डूबती नज़र आने लगी थी ।

पुलिस बार-बार घर चक्कर लगाने लगी ।

बाऊजी की तबियत आहिस्ता- आहिस्ता खराब होने लगी ।

लक्ष्मीदत्त को रोज़ सुबह थाने बुलाया जाने लगा औऱ वो शाम को टूटे हुए घर आने लगे ।

अगले दिन जैसे ही पुलिस लक्ष्मी भाई साहिब को लेने आती । भाभी कोटिलया प्रताप भाई साहब (जेठ जी ) के पाँव पड़ रो रो कर मुआफी की गुहार करने लगी ।

उसी बीच बाऊजी को एक बहुत जबरदस्त  दिल का दौरा पड़ा ।
प्रताप भाई साहब ने मुझे साथ लिया और उन्हें अस्पताल ले गए ।
मुझे याद है सुहासिनी --
( देवदत्त कहते कहते बहुत छुपाने की कोशिश की मगर उस वक़्त बहुत भावुक हो चुके थे औऱ सिसकने लगे )
तीन दिन तक हम घर वापिस नहीं आये । वहीं अस्पताल में ही रहे औऱ बाऊजी आई.सी.यु में ।

       चौथे दिन डाक्टर ने बताया कि बाऊजी अब खतरे से बिल्कुल बाहर हैं । आप उन्हें मिल सकते हैं ।

प्रताप भाई साहब ने मेरी तरफ देखा जैसे पूछ रहे हों कि चलेगा साथ ?

मैं भी उठ खड़ा हुआ और उनजे साथ अंदर जाने को तैयार ही गया ।

हम पन्द्रह मिनट तक अंदर रहे ।

पूरी तरह मौन ....

मगर दस मिनट तक दोनों की आँखों ही आँखों में जो मौन बातें हुईं और वहां से निकलते वक्त बाऊजी जी को जो चैन मिला । सुहासिनी उसे मैं आज भी महसूस कर सकता हूँ ।

भाई साहब ने आई सी यू रूम से बाहर निकलते हुए बाऊजी की बाजू को दबाते हुए कहा -- चिंता मत कीजियेगा । सब ठीक हो जाएगा ।

उस दिन पहली बार हम अस्पताल से घर गए ।

घर पहुँचते ही भाई लक्ष्मी प्रताप के पाँव पड़ के मुआफी  मांगी और धन्यवाद भी किया ।

मुझे उस वक़्त तो कुछ समझ नहीं आया कि ये सब क्या हुआ ।
मगर बाद में पता चला कि भाई साहब प्रताप ने खानदान की नाक न कट जाए इसलिए अपने गहरे रसूक को इस्तेमाल कर सारा केस ही रफा दफा करवा दिया । किसी को कानों कान खबर भी न हुई ।

बाऊजी जी और प्रताप भाई साहब की मौन बातचीत का इतना गहरा मतलब मुझे बाद में समझ आया ।

"फिर ?"-😢,- पूछते हुए सुहासिनी की आँखें इस वक़्त नम ही चुकीं थीं ।

फिर क्या ?

उसके बाद धीरे-धीरे प्रताप भाई ज़्यादा ग़मगीन औऱ मौन रहने लगे गए औऱ अपनी बेटी की तरफ ध्यान देना शुरू किया ।

बाद में उनकी दो बेटियां और हुईं टिया औऱ दिया ।

एक-एक कर अपनी बेटियों को पढ़ाना शुरू किया ।

बड़ी बेटी को तो हमारी शादी से पहले ही कनाडा सेटल कर दिया ।
तब तक मेरी नॉकरी भी लग गयी थी।

प्रताप भाई साहब को मेरी शादी की चिंता बहुत रहती थी । उसके बाद वो मुझे ही बेटा मानते थे ।

उन्हीं के रसूक में तुम्हारे पिता जी से बात कर  मेरे लिए तुम्हारा हाथ मांग लिया औऱ हमारी शादी धूम धाम से हुई ।

गाड़ी अब धीरे-धीरे चलने लगी थी शायद कोई स्टेशन आने वाला था ।

सुहासिनी ने उठ कर इधर उधर देखा कोई कोल्ड ड्रिंक वाला दिखाई दे जाए ।

खिड़की से बाहर बूट पालिश वाले को पाँच रुपये देकर बोला जा कोई कोल्ड ड्रिंक वाले को भेज ।

वो पाँच मिनट में खुद ही के आया । उससे दोनों बोतल लेकर सुहासिनी ने उसे पचास रूपये दिए ।

अब देवदत्त औऱ सुहासिनी बोतल पीते पीते कुछ हल्का महसूस करने लगे ।

सुहासिनी ने फिर पूछा-- "तो प्रताप जेठ जी ने कभी कोई बात ही नहीं छेड़ी?"

देवदत्त ने फिर एक लंबा और गहरा साँस लिया औऱ कहा ---" ,हाँ सुहासिनी !! मैंने ज़िन्दगी में ऐसा इन्सान कभी नहीं देखा"

"कितना बड़ा  दिल उनका ? इतना सेक्रिफाईस ?"--सुहासिनी ने फिर कहा ।

"फिर ?"-- सुहासिनी ने फिर पूछा ।

बाकि दोनों बेटियों को भी कनाडा सेटल कर अब वो ख़ुद भी वहॉं जाने की तैयारी करने लगे थे ।

"पर तुमने मुझसे तो कभी बात नहीं कि इस बारे में"--सुहासिनी बोली ।

"क्या बात करता ? वो तो मुझे भी कहने लगे थे साथ चलने के लिए" -- देवदत्त मुँह में बड़बड़ाते हुए बोले -- "लेकिन हमारे बच्चे अभी छोटे थे ।"

लक्ष्मी भाई साहब तो बस बाऊजी औऱ माता जी की चमचा गिरी में ही लगे रहते थे । ख़ुश थे कि प्रताप भाई चले जायेंगे ।

जब मैं भी सेटल हो गया । बहिनों की शादियां भी हो गयीं ।

तब प्रताप भाई ने धीरे-धीरे कारोबार को हाशिये पे ला खड़ा किया ।

बाऊजी प्रताप की कार-गुजारी से भली-भांति वाकिफ थे ।

लेकिन वो चुप थे ।

लक्ष्मी भाई साहब को किसी बात की खबर तक न लगने दी ।

लेकिन लक्ष्मी भाई ये ज़रूर कहने लगे थे कि अब इस कारोबार में वो मजा नही रहा ।

मगर बाऊजी को बार बार दबाव डालने में लगे थे कि कारोबार उनके नाम कर दो ।

आपकी तबीयत भी ठीक नहीं रहती ।

अब बाऊजी को भी पता था कि अब कारोबार में रह ही कुछ नही गया तो

उसी साल अपना सब कुछ समेट कर, भाई प्रताप, इंडिया को अलविदा कह  गए ।

उनके जाने के बाद का तो तुम्हें पता ही है कि आमदनी घटती गयी । घर में बात-बात पर झगड़े होने लगे ।

लक्ष्मी भाई साहब के दोनों बच्चों की पढ़ाई के चलते बहुत पैसा लग रहा था ।

जब भी लक्ष्मी भाई कारोबार कु बात करते बाऊजी जी प्रताप के आने की बात कह टाल जाते ।

बाऊजी जी को लक्ष्मी भाई साहब पर तरस भी आ जाता था । बच्चों की पढ़ाई का सारा खर्चा बाऊजी उठा रहे थे ।

मुझे ये अच्छा नहीं लगता था ।

ऐसा लगने लगा था कि लक्ष्मी भाई साहब सब कुछ हड़पने के चक्कर में थे ।

बाऊजी की तबियत वैसे ही ठीक नहीं थी । यही वजह रही थी कि बाऊजी ने हम दोनों को बुलाकर बताया भी औऱ इस्लाह भी ली थी । मैंने उस दिन प्रताप को भी शामिल करने की बात भी कही थी ।
पर पिता जी ने कहा कि उस से बात हो गयी है ।

फिर जो बात हुई तुम्हें पता ही है ।
सुहासिनी अब ग़मगीन थी ।

गाड़ी फिर रुकी ।

कुली एकदम अंदर गुसे । सामान उठवा कर गाड़ी से बाहर के गए ।

देवदत्त ने टैक्सी बुलाने के लिए जैसे ही फ़ोन उठाया फ़ोन की घंटी बज उठी ।

---हर्ष महाजन

◆◆◆◆◆

क्रमश:

भाग-7
Coming soon


Wednesday, June 30, 2021

बैडरूम- भाग-5

 

बैडरूम- भाग-5
◆◆◆◆◆◆

                           नई दिल्ली  टी-3 इंद्रागांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट  पर उतरते ही मुकेश दत्त ने बाबूजी ( देवदत्त ) को फ़ोन लगाया और कई बार फ़ोन डायल किया मगर फोन स्विच ऑफ ही आता रहा । 

मुकेश का धैर्य अब जवाब देने लगा था । घर पहुँचने से पहले अपने आने की सूचना देना चाहता था ।

बड़े भाई राजेश से तो वह बात भी नहीं करना चाहता था ।

प्लेन में बेल्ट-6 की अनाउंसमेंट सुन वो अपने सामान की ओर अग्रसर हुआ ।  बार बार  फ़ोन ट्राई किये जा रहा था लेकिन स्विच ऑफ की आवाज सुन-सुन कर वो पकने लगा था । अब झुंझलाहट भी होने लगी ।

फिर उसने पत्नी एकता को काल मिलाया और उसे सूचित किया कि वो ठीक-ठाक पहुँच गया है । उसको  कहा कि बाबूजी का फ़ोन नहीं लग रहा तुम ही उधर से इतला दे देना और रखते रखते फिर कहा - "सुनों फ़ोन न लगे तो भाई साहब ( राजेश) को ही इत्तला कर देना ।"

मुकेश ने अपना सामान रेढू पर रखा औऱ टैक्सी स्टैंड से - विकास पूरी के लिए टैक्सी ले ली ।

टैक्सी में सफ़र शुरू होते ही उसके मस्तिष्क में जैसे हलचल होने लगी ।  सोचने लगा --चार साल हो चुके हैं उसे अपना घर छोड़े हुए ।

चार साल बाद घर जा रहा हूँ।

हर छह महीने बाद एयरपोर्ट के पास होटेल में रुक कर  कार्यवाही की तरह वहीं से वापिस अमेरिका लौट जाना !  जैसे एक प्रक्रिया सी बन गयी थी ।

टाटा समूह की नामी ग्रामी कंपनी में एक अच्छे पद पर पहुँच चुका था  मुकेश । ये सोचकर भी उसमें अहम भाव बढ़ने लगा था ।

मुकेश गहरी सोचों में डूबता चला गया ।

      एकता हर ट्रिप पर जोर देती थी कि बाबूजी को इस बार ज़रूर मिल के आना और हर बार मैं उसे कोई न कोई बहाना बनाकर बेवकूफ बना दिया करता था । लेकिन वो अंदर से सब समझ जाया करती थी ।

बाबूजी से एकता को बहुत प्यार था ।  वो भी तो उसका बहुत ख्याल रखते थे ।

इस बार तो एकता ने मुकेश को धमकी ही दे डाली थी । अबकि बार अगर बाबूजी के पास नहीं हो कर आये ? तो मैं अगली बार दिल्ली जाने के बाद वापिस नहीं आऊंगी ।

बस उसी का कहना मानते हुए  इस बार घर जाने को तैयार हो गया था ।

उसे अच्छी तरह याद है 25 जून 2017 का वो मनहूस दिन जिस दिन उसने घर छोड़ा था ।

छोटी सी ही तो बात थी !!

मैंने बाबूजी से यही तो बोला था कि दूसरे तल पर भी एक टॉयलेट बनवा दो, सुबह-सुबह सभी को नीचे आना पड़ता है और नीचे एक टॉयलेट में लाइन लग जाती है ।

लेकिन बाबूजी ने कहा था अगले साल देखेंगे ।
लेकिन भैया को पिछले साल एक बार ही कहने से पहले तल पर टॉयलेट बनवा दिया था ।

ये सोच मैंने भी कह दिया कि --"अगर नहीं बनवाना तो मैं भी यहाँ नहीं रहूँगा ।"

मेरी कम्पनी  मुझे यू.ए.स में चल रहे प्रोजेक्ट में भेजना चाहती थी और मैने अगले दिन हाँ करने के लिए सोच कर सो गया था ।

एकता उन दिनों मायके गयी हुई थी । बस सुबह उठा और ऑफिस जाते वक़्त बाबूजी को बोला --- बाबूजी मुझे कंपनी एक प्रोजेक्ट के लिए बाहर भेज रही है । अगर तंग होकर ही घर पर रहना है तो मै आज प्रोजेक्ट पर साईन कर दूँगा ।

लेकिन बाबूजी ने इस बात पर कोई जवाब ही नहीं दिया था ।

भाई राजेश भी मूक बने खड़े देखते रहे थे । उन्होंने भी किसी तरह की रोकने की कोई कोशिश नहीं की ।
उस दिन घर छोड़ते वक़्त बाबूजी ने, अगर एक बार भी, पीछे से आवाज लगायी होती तो-------।

तो मन कभी भी गगर से जाने की न सोचता ।

गुस्से में मेरे मुँह से काल ने वो शब्द निकलवा दिए पर----
मेरा मन कतई नहीं था बाबूजी औऱ माँ को ऐसे छोड़कर जाने का ।

न जाने उस दिन वक़्त ने क्या करवट ली कि कदम इतने भारी लगने लगे थे,  कि जैसे किसी ने जकड़ लिए हैं ।

आखिरी कदम तक--उम्मीद थी, कि बाबूजी मुझे किसी हालत में मुझे घर से दूर नहीं जाने देंगे ।

मुझे लगता था--- जैसे दुनियाँ में सबसे ज़्यादा प्यार बाबूजी,  मुझे ही करते हैं ।
 
ये कैसा वक़्त था --जो ख़ुद, मैंने ही खरीद लिया ।

लेकिन......आख़िरी कदम दहलीज़ से पार हो गया--- पीछे से कोई आवाज नहीं आई ।

औऱ उस दिन के बाद मैनें  कभी  फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा ।

इस बार एकता ने जोर देकर  कहा था कि घर होकर और बाबूजी से मिलकर आना ।

वो और बच्चे तो दो महीने पहले अपने भाई राकेश के साथ आ कर वापिस गयी थी ।

टैक्सी अभी भी फर्राटे भर रही थी । जैसे-जैसे टैक्सी आगे बढ़ रही थी मुकेश के दिल की धड़कन भी तेज़ हो रही थी । बाहर देखा तो सब कुछ बदल बदला सा नज़र आ रहा था । धौला कुआँ क्रास हो रहा था । इतने में फ़ोन की

घंटी बज उठी । देखा तो एकता का था ।

बोलो एकता बात हुई ??

एकता बोली--मुकेश !! वहां से कोई भी फ़ोन नहीं पिक कर रहा ।
बाबूजी का फोन मुझे भी स्विच ऑफ ही आ रहा है ।

भैया उठा नही रहे ।

भाभी कामिनी का मिला रही हूँ, वो भी आउट ऑफ रीच ही आ रहा है ।

जैसे ही मिलता है, मैं वापिस तुम्हें फ़ोन करती हुँ -- एकता थोड़ी अपसेट होते हुए कहा ।

ये सुन मुकेश भी थोड़ा  अपसेट हुआ कि आख़िर सब के फ़ोन अचानक क्यूँ पहुंच से बाहर हो गए ?

एक मन ये सोचने लगा----"कहीं मेरे आने की ख़बर तो नहीं लग गई इन्हें ?"
और जानकर सब हमारा फ़ोन न पिक कर रहें हों ?

दूसरा मन---"नहीं, नहीं ---ऐसा नहीं हो सकता । वो तो बल्कि मेरे आने से ख़ुश ही होंगे ।"

इसी दुविधा में टैक्सी में बैठा मुकेश घड़ी में टाईम देखने लगा ।

सुबह के छह बजे थे ।

ओ हो -- अभी तो वक़्त ही क्या हुआ है ? अभी तो सब सो ही रहे होंगे -- ये सोच मुकेश को जैसे कुछ तसल्ली हुई ।

विकास पूरी ब्लाक बी पहुँचते पहुँचते सात बज गए । मुकेश ने टैक्सी ब्लाक का मेंन गेट पार कर तीसरे मकान के आगे रुकवा दी । टैक्सी से उतर सामान उतरवाया और बिल देकर टैक्सी वाले को विदा कर अपने घर की ओर रुख़ किया ।

बाहर का गेट खोलने के लिए जैसे ही उसे अंदर धकेला --- उस पर ताला हिलने लगा ।

ये देख़ मुकेश इधर- उधर बगले झाँकने लगा ।

गली में दरवाज़े के आगे सामान रख  --- मुकेश सोचने लगा कि अब क्या किया जाए ।

इतने में पड़ौस से एक औरत सफाई करती हुई बाहर निकली । 

मुकेश ने उसे पहचान कर  आवाज लगाई --- "मालती आँटी ?"

मालती ने मुँह उठाकर उसकी ओर देखा और पहचानने की कोशिश करने लगी ।

ये देख़ - मुकेश ने ख़ुद अपनी पहचान बताई--- "आँटी मैं मुकेश ।"

"पहचाना नहीं मुझे ??"--मुकेश ने दोहराया ।

"ओ~~~~मुक्की ?"--मालती पहचानते हुए बोली ।

"अरे तुम कब आये ?"--- आगे आते हुए मालती बोली ।

सामान बाहर पड़ा देख़ वो बोली- 'तुम्हें नहीं पता?"

मुकेश ने प्रश्न भरी निगाहों से मालती की ओर देखा ।

"सारे अस्पताल गए हुए हैं" - मालती ने बताया ।

"अस्पताल ?" - हैरान होते हुए मुकेश ने पूछा ।

"पिन्टू गंगाराम अस्पताल में दाख़िल है ना ?''--मालती ने जैसे कोई राज़ खोला हो ।

"क्या हुआ उसे ?"

"कल सुबह वो बाहर कहीं से आये थे ।"- मालती फिर बोली और बोलती चली गयी ।

"गाड़ी से उतर वो सीधा दादू दादू कर अंदर भागा । नीचे कमरे में उन्हें न पाकर वो ऊपर भागा ।"

"उसे शायद पता था सुबह दादू छत पर पौधों को पानी देने ज़रूर जाते हैं ।"

'उन्हें जब वहां भी नहीं मिले तो वो फिर दादू दादू करता नीचे की ओर वापिस दौड़ा ।"

     "सीढ़ियां उतरते वक़्त वो बस संभाल न पाया, गिरता चला गया । सर बुरी तरह फट सा गया  उसका ।"

"फटाफट उसे अस्पताल ले गए ।  बेहोश हो गया था बेचारा । बहुत खून बह गया था ।"

रुक कर मालती फिर बोली: -- "हाँ चाबी दे गए हैं मुझे --आप सामान तो अंदर रखो ?"

"राजू (राजेश) को फ़ोन मिला लो न ?"- मालती फिर बोली ।

"आँटी सुबह से मिला रहा हूँ दोनों का फ़ोन नही लग रहा । न भाई का न भाभी का ।"---मुकेश ने कहा 

"मुझे जल्दी अस्पताल जाना चाहिए ।"

"हाँ हाँ आओ हमारे घर ही  फ्रेश हो कर चाय पीकर आप निकल जाना ।"

अस्पताल में कोई वार्ड वगैरह कुछ ????---मुकेश ने पूछा ।

मालती जितना जानती थी उतना बताने लगी---"हाँ रात को राजू सामान व कपड़े लेने आया था, तो बता तो रहा था किए को फ़ोन पर----कुछ नई बिल्ड़िंग में आई सी यू~~~"

"आई सी यू???"- मुकेश घबराया हुआ बोला ।

"आँटी फिर मैं जल्दी निकलता हूँ ।"

"उन्हें ज़रूरत पड़ सकती है ।"

"आप मेरा ये बैग आप ही अंदर रख देना ।"

कह कर फ़ोन पर टैक्सी बुक करवाता हुआ बाहर से ही मेन रोड़ की ओर निकल गया ।

हर्ष महाजन 'हर्ष'
◆◆◆◆◆◆

क्रमश:

भाग-6
Coming soon


Tuesday, June 29, 2021

बैडरूम- (भाग-4)

 

बैडरूम- (भाग-4)

★★★★★★★★
लुधियाना- मॉडल टाउन
वक्त:         सुबह - ढाई बजे
जगह:        वही पुरानी पुश्तैनी हवेली ।
*************

           पहली मंजिल पर बने अपने चार आलीशान कमरों में से एक में देवदत्त आधी रात, परेशान से पलंग पर कभी इधर कभी उधर करवटें बदल रहा था ।

नींद नदारद !!
आँखों से कोसों दूर लग रही थी ।
खुली आंखें, कभी कमरे की छत की तरफ निहारते हुए,
तो कभी साथ में बेसुध सोई, पत्नी सुहासिनी की तरफ ।

अज़ीब उलझनों से रूबरू हो रहे थे देवदत्त ।

अचानक सुहासिनी ने करवट बदली,

उन्नीदी सी हल्की सी नज़र उसकी देवदत्त पर पडी । तो वह हड़बड़ा कर उठ बैठी ।

क्या हुआ ?
नींद नहीं आ रही क्या ??

चाँद की रोशनी खिड़की से अंदर की ओर झाँक रही थी । उसकी रोशनी में देवदत्त की नम आंखों ने न चाहते हुए भी चुगली कर दी ।

ये देख़ सुहासिनी का दिल सहम सा गया ।

उठ कर जल्दी से उन्हें हिलाया ।

सर पर धीरे-धीरे हाथ फेरते हुए कहा-  आप चिंता न कीजिये, सब ठीक हो जाएगा ।

थोड़ा रुक कर सुहासिनी फिर बोली---आपके घर में ---आपके साथ इतना कुछ हुआ, पर आज तक आपने मेरे साथ कुछ भी साझा नही किया । कभी भी अपना दिल हल्का नहीं किया ।
कब तक अकेले ये सब ढ़ोते फिरोगे ?

देवदत्त अभी भी छत की तरफ शून्य में देख रहे थे ।

उनके चेहरे पर बार-बार पीड़ा के भाव आने जाने लगे ।

सुहासिनी रुक कर फिर बोली--
सब कुछ क्या अपने अंदर सीने में दबा कर ही रक्खोगे ?

सुहासिनी पलंग से उठी और साथ टेबल पर पड़े जग से एक गिलास पानी का देवदत्त को दिया ।

एक घूंट पी कर गिलास वापिस पकड़ा दिया ।

सुहासिनी ने हिम्मत कर देवदत्त से बोला--- मन हल्का करोगे तो अच्छा लगेगा ।

देवदत्त ने एक बार सुहासिनी की तरफ भीगी निगाहों से देखा जैसे सोच रहे हों कि बात करूँ या न करूँ ।

तो अचानक ही सुहासिनी भावुक हो अश्क़ों से उलझ गई । शायद ऐसा मौका पहली बार ही आया था जो देवदत्त ने ऐसी निगाहों से उसकी तरफ देखा हो ।

देवदत्त ने सुहासिनी के माथे पर एक छोटा सा प्यार का तोहफा दिया और मुसलसल बोलते चले गए -

सुहासिनी---- पता नहीं ----रात से ही
दिमाग में हज़ारों उलझते प्रश्न बार बार कौंध रहे हैं ।

मेरे साथ ही क्यूँ ऐसा होता आया है ? 

भाई लक्ष्मी सदा से ही गिरगिट की तरह रंग बदलते आये हैं ।

बाऊजी जब विल बना रहे थे तो मैंने एक माकूल सलाह दी थी कि हम भाई बहिनों में सभी को बराबर हिस्सा लिख दीजियेगा । कोई झंझट ही नहीं रहेगा ।

ये सुन - बाऊ जी को बहुत अच्छा भी लगा था ।

हम तीन भाई और तीन बहने
छह ही तो थे ।
तीन भाई --प्रताप, लक्ष्मी और मैं
औऱ तीन बहिनें---राधा, कमला औऱ संतोष ।

लेकिन रात भी नहीं बीती ।

बाऊजी ने मुझे बुलाया और बताया कि विल में उन्होंने बहिनों का नाम न शामिल करने का सोचा है ।

इतना सुन सुहासिनी ने देवदत्त को बीच में ही टोका कि---बाऊजी ने अगर विल लिखनी ही थी तो चुपचाप लिखते न । जो उनके मन में था लिख देते । सबको बुलाकर पूछने की क्या ज़रूरत थी ?

देवदत्त थोड़ी देर चुप हो गए । फिर बात का संदर्भ समझाते हुए बोले --- असल हमारे बड़े भाई साहब औऱ भाई के बीच दुश्मनी भाव काफी मुखर हो चुका था जिसकी वजह से प्रताप भाई साहब घर छोड़ गए थे ।

ऐसी क्या बात हुई उन दोनों के बीच  ? आपने तो आज तक कभी जिक्र ही नही किया और न   किसी ओर ने बताया ??

सुहासिनी अब परेशान सी दिखने लगी ।

देवदत्त ने फिर आगे कहा--- मैं उस वक़्त बहुत छोटा था । लेकिन वो भयानक मंज़र याद करते हुए आज भी दिल दहल जाता है । तुम्हारे आने से  बहुत पहले की बात है ।
बहुत लंबी कहानी है इस बारे में फिर कभी बात करेंगे ।

"लेकिन"-- सुहासिनी ने फ़िर कहा -----
"जब मेरी शादी हुई तो वो हमारे साथ ही तो थे भूतल पर ।
हम पहले तल पर और लक्ष्मी जेठ जी दूसरे तल पर । हाँ -- मेरे आने के बाद दो तीन साल बाद ही वो चले गए थे ।"

हाँ--देवदत्त ने कहा ।

अब सुहासिनी --- देवदत्त को ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगी  ।

देवदत्त ने आगे कहा----
इसलिए बाऊजी सब को बताकर विल लिखना चाहते थे ।
उनकी तबियत ठीक नहीं रहती थी और बाद में झगड़े न हों । शायद उन्हें अहसास होगा इस बात का ।

देवदत्त बिना ये महसूस किए कि सुहासिनी क्या सोच रही है ? अपनी बात कहते चले गए । बाऊजी ने विल  ।

दीवार की तरफ देखते हुए देवदत्त फिर बोले---

बहिनों का क्या क़सूर था ?
बाऊजी का दिमाग क्यूँ बदला ? औऱ किसने बदला ?

भाई साहब ने रातो रात बाऊजी का दिमाग ऐसे कैसे बदल दिया था ?

हालांकि सबसे बड़े भाई प्रताप दसवीं पास थे ।
मगर भाई लक्ष्मी तो पढ़े लिखे भी नहीं थे ।
लेकिन शातिर बहुत थे ।

जब मैंने उस विल पर आपत्ति की तो ---- बाऊजी ने सीधा फरमान सुना दिया कि जो कह दिया वैसे ही होगा ।

इस बात पर मैंने गुस्से में कह दिया ---मुझे भी फिर कुछ नहीं चाहिए । मैंने ये सोचकर कहा कि इस बात से बाऊजी पर असर होगा वो मान जाएंगे ।

लेकिन ऐसा कुछ न हुआ ।

मैंने फिर जोर से कहा---  "मैं भी अब यहाँ से चला जाऊँगा ।"

मेरे ऐसा कहने पर भी बाऊजी पर जैसे कोई असर ही नहीं हुआ ।
भाई लक्ष्मी ने न जाने ऐसा क्या जादू किया था उन पर ।

भाई लक्ष्मी भी वहीं खड़े मौन हो मेरा ये फैसला सुन रहे थे ।
वो भी एक शब्द न बोले ।

सबसे बड़े भाई साहब प्रताप बहुत पहले घर छोड़ कर कनाडा चले गए थे ये तुम्हें पता ही था ।

बड़े भाई लक्ष्मी ने मेरे साथ ऐसा क्यूँ किया.........?

ते सभी प्रश्नों के साथ
अगले दिन मैंने तुम्हारे साथ अपना आत्म सम्मान लिए ये घर छोड़ दिया ।

आज सताईस साल हो गए उस बात को----जब मैंने ये आलीशान घर छोड़ा । भूले नहीं जाते वो पल ।

छोटे छोटे तीन बच्चों के साथ बिना कोई सामान उठाये इस घर को अलविदा बोल दिया था ।

जब घर छोड़ा ---उस वक़्त भी भाई साहब मूक क्यूँ बने रहे ?

"ये तो हमें भी समझ नहीं आया था" --सुहासिनी बीच में ही बोली ।

जब अपना उल्लू सीधा हो गया , बच्चे पढ़ लिख गए ? बाऊजी को नाकारा कर सारा धंधा अपने हाथ में ले,  जैसे तैसे अपनी गलती मान कर हमसे रिश्ता तो कायम कर ही लिया उन्होंने ।

लेकिन वो मेरे दिल में जगह तो नहीं बना पाए और न ही बना पाएंगे ।
एक लंबी सांस लेते हुए देवदत्त ने आगे कहा--
सत्ताईस साल....बाऊ जी को याद कर आँखे अब भी नम हो जाती हैं ।  उन्हें नाज़ था लक्ष्मी भाई साहब पर । पता नहीं क्या विश्वास था ? लेकिन अचानक वी दुनियाँ छोड़ गए और कॅरोना का हवाला देकर किसी को बुलाया भी नहीं ?

उनके जाने के वाद तो----
बार-बार भाई मुझे फ़ोन कर कर लुधियाना बुलाते---- पर मेरा मन यहाँ आने को इज़ाज़त ही नहीं देता था ।

इतिहास किस तरह अपने आप को दोहराता है ।

कहते कहते देवदत्त दो बार सिस्के औऱ फिर बोले----

सुहासिनी -----हमने !!

अपने एक-एक बच्चे को बड़ी तन्मयता से पढ़ाया लिखाया । बड़ा बनाया । मुकेश दत्त एम.बी. ए कर के टाटा में नॉकरी करता हुआ अमेरिका निकल गया ।

एक बार क्या गया बस वहीं का हो गया । उससे तो मुझे पहले ही कोई उम्मीद नहीं थी ।

"मगर -- राजेश"----इतना कह कर देवदत्त फिर परेशान हो उठे ।

सुहासिनी अब तक जो चुप चाप सुन रही थी अचानक टूट कर सुबक पड़ी औऱ बोली--- आप भी तो ----जब छोटे ने -- जाने की बात कही थी--तो मौन ही रहे थे न ?

कहते हुए रो पड़ी औऱ कहा-
"है तो आप ही का बेटा न वो ।"

देवदत्त वह बोले:-----
"हाँ ---सुहासिनी"---कहा न--- "इतिहास अपने आप को दोहराता ज़रूर है ।"

"पर राजेश ?"---कहते हुए प्रश्न चिन्ह की तरह सुहासिनी की तरफ देख देवदत्त बोला ।

'अब भी तो वही कर रहे हो' -- सुहासिनी अटकते हुए बोली ।

बिना उसे कुछ कहे आप वहाँ से क्यूँ निकले ?

देखते तो सही वो क्या करता है ?

फिर इस उम्र में भी क्या कोई कमी है आपके पास ?

जी.एम. के पद से सेवा निवृत्त हुए हो । अच्छी पेंशन मिलती है । आहे उसके बाद भी अच्छी कम्पनी में अच्छे पद पर हो । सेवा निवृत्त के बाद भी मोटी इनकम है ।
बेटी - 'लता' की अच्छे घर में शादी भी कर दी । दामाद भी हमारी बहुत इज़्ज़त करता है ।

तीनों ही बच्चे कभी भी पलट के हमारे आगे नहीं बोले ।

"अब और क्या चाहिए आपको" - सुहासिनी ने कहते हुए समझाया ।
सामने घड़ी पर सुहासिनी की नज़र पड़ी तो चोंक गयी...
(सुबह के छह बज चुके थे ।)
चलो उठो अब:-

'सबसे अच्छा परिवार है हमारा' - कहते हुए जैसे ही सुहासिनी उठी ।
बाहर से जेठ लक्ष्मी दत्त की मोटी आवाज कमरे तलक चलती हुई आई -- देवदत्त, बहु ठीक ही तो कह रही है ।

'सबसे अच्छा परिवार है हमारा'
औऱ बहुत बड़ा परिवार है ।

जेठ जी की आवाज सुन सुहासिनी उठ के बाहर निकल गयी ।

औऱ देवदत्त  एकदम उठ के बैठ गए ।

लक्ष्मी भाई फिर बोले--- 'देवदत्त'  अब तुम भी सब यहीं आ जाओ । इतना बड़ा घर है । जब से गये हो तुम्हारी भाभी रोज़ आपकी धरोहर (घर) की साफ सफाई ज़रूर करवाती है ।
कहती है पता नही किस दिन देवर जी आ जायें ।
देखो न आपका बैडरूम कितना सजा के रखा है ।

देवदत्त बोले--- हाँ भाई साहब सजा तो है लेकिन:-

_*किसी घर में एक साथ रहना परिवार नहीं कहलाता । एक दूसरे को समझना और एक दूसरे की परवाह करना परिवार कहलाता है ।*_

भाई लक्ष्मी, देवदत्त की बात सुन एक दम चुप हो गए ।

ये बात उन्हें गहरी चोट कर गयी ।
उदास स्वर में बोले:- तो तुमने हमें मुआफ़ नहीं किया ?

देवदत्त ने ये सुन कहा- अगर ऐसी कोई बात होती तो क्या मैं यहॉं आता ?
लेकिन भाई साहब--सताईस साल ज़िन्दगी के यूँ ही निकल गए ।

भाई लक्ष्मी ने देवदत्त को पलंग से खींच कर गले से लगाया औऱ पीठ थपथपाते हुए कहा --सब ठीक हो जाएगा ।

चलो नीचे चलो बेटे राजेश का कई बार फ़ोन आ लिया । उसको फ़ोन कर लो । बोल रहा था तुम्हारा फ़ोन बन्द आ रहा है ।

तुमने आफ कर रखा है क्या?

नहीं बस वो चार्जर ही नही लाये न हम--धीरे से देवदत्त ने बोला ।

चलो नीचे चल के चार्ज कर लेना ।
नीचे पहुँचते ही राजेश का फ़ोन फिर दनदना उठा । लक्ष्मी दत्त ने फ़ोन उठाने की बजाय सीधे देवदत्त के हाथ में दे दिया ।

देवदत्त ने फ़ोन कान से लगाया ही था उधर से चीखने चिल्लाने की आवाज़ें आने लगी ।

क्या हुआ ??---क्या हुआ??
उधर से कामिनी की एक ही आवाज़ आयी वो~~~~बाऊजी ~~~पिंटू....

ये सुन देवदत्त वहीँ छाती पर हाथ रख नीचे झुकते चले गए ।

क्या हुआ---क्या हुआ---

चारों ओर गूँजने लगा ।



-----हर्ष महाजन

◆◆◆

भाग-5

प्रकाशित हो चुका है । 


बैडरूम - ( भाग-3 )


          राजेश और कामिनी को बाज़ार में  कुछ साजो सामान लेते हुए वक़्त कुछ ज़्यादा ही लग गया । सामान लेकर कोठी पर वो वापिस लौटे ।
थोड़ा अंधेरा हो चुका था । लेकिन कोठी का दरवाजा खुला था ।

दोनों हैरान इस बात से थे कि बाबू जी ने घर की लाइट भी नहीं जलाई । अंधेरे में ही बैठे हैं?

पिंटू सो चुका था ।

राजेश दिमाग में किसी अनहोनी का अंदेशा लिए अंदर की ओर बढ़ा । कामिनी भी पीछे पीछे आगे बढ़ी ।

मगर अंदर कोई भी नहीं था ।

न माँ न बाबू जी ।

सारी खुशियाँ पलक झपकते ही  काफ़ूर हो चुकी थीं ।

पिंटू को पलंग पर लिटा राजेश-- बाहर की ओर भागा ---

लेकिन

सारी गली शांत पड़ी थी । इधर-उधर देखा तो उसकी नज़र सामने कोठी की छत पर एक बुजुर्ग पौधों को पानी की फुहार कर रहे थे ।

प्रश्न चिन्ह निगाहों से राजेश ने उनकी ओर देखा ।

तो उस बुज़ुर्ग ने अपनी उम्र के अनुभव से राजेश की परेशानी को समझते हुए  राजेश को ऊपर से ही बताया कि कुछ देर पहले एक ऑटो आया था । एक बुजुर्ग दंपति आपके घर से निकल कर  उस ऑटो से गए हैं ।

राजेश उस शख्स को धन्यवाद देता हुआ अंदर आ गया ।

हैरान परेशान राजेश बुदबुदाता हुआ ...कमाल है....बिना बताए ...न फ़ोन किया....औऱ चले गए । कुछ समझ नही आया .....

कामिनी ने राजेश को बुदबुदाते हुए देख पूछा-- क्या हुआ? कुछ पता चला ?

हद है कामिनी...देखो न ( हकलाते हुए) बाबू जी बिना बताए चले गए ।

कामिनी ने ढांढस बंधाते हुए कहा ---- यहीं कहीं गए होंगे फ़ोन क्यूँ नहीं कर लेते ?

हाँ.. हाँ...करता हूँ। ( घबराहट में राजेश भूल ही गया कि फ़ोन से पूछने का विकल्प उसके पास था)

अभी फ़ोन करने ही लगा था कि राजेश का मोबाइल बज उठा । नंबर देखा तो राजेश की जैसे बाछें खिल उठीं ।

बाबूजी का फ़ोन कामिनी की ओर देख कर राजेश ने फ़ोन उठाया ।

हेलो ...बाबूजी कहाँ चले गए आप ?

हम कितना परेशान हो रहे हैं यहॉं  आपको मालूम है ?

उधर से बाबूजी ने कुछ बोला....

राजेश एक दम परेशान हो उठा..
पूछा----क्या हुआ दादी को?

थोड़ी देर बाबूजी कुछ कहते रहे और राजेश सुनता रहा ।

फोन बंद कर राजेश एक दम निढाल हो कुर्सी पर बैठ गया ।

ये देख अब कामिनी भी परेशान हो गई । उसने राजेश से पूछा हुआ क्या?

कुछ बताइए भी ?

कामिनी वो... दादी जी को... हॉस्पिटल ले गए हैं ..लुधियाना ।
औऱ---औऱ

बाबू जी लुधियाना के लिए निकल गए हैं ।

ऐसे कैसे?...कामिनी घबराई हुई बोली...कम से कम फ़ोन कर के बता तो देते । हम भी साथ चलते ?

राजेश कामिनी से सहमत था । और कहा बाबू जी ने कहा उन्होंने बहुत बार फ़ोन किया पर हमारा फ़ोन अनरीचेबल था ।

कामिनी---हाँ हम बेसमेंट में थे न ....

औऱ सलाह दी----
आप ऐसा करो ताऊ जी को फ़ोन लगाओ ।

उनसे बोलो हम आ रहे हैं

कामिनी की सलाह मान--

राजेश ने ताऊ जी को लुधियाना फ़ोन लगा दिया ।

हर्ष महाजन
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आगे:
भाग-4 प्रकाशित हो चुका है ।


Saturday, June 26, 2021

बैडरूम - ( भाग-2 )

 

                     लुधियाना मॉडल टॉउन में बनी एक बड़ी आलीशान हवेली, पुराने जमाने का कीलों वाला दरवाजा और ऊपर दीवार के दोनों ओर पिलर जिसपे संगमरमर के हाथी सुसज्जित थे । देवदत्त और सुहासिनी बाहर खड़े हुए उस दिन को याद कर रहे थे जिस दिन उनके पिता ने उन्हें ये कहा था कि मेरे अंतिम समय पर आने की कोई ज़रूरत नहीं ।
उस दिन को याद करते हुए देवदत्त की आंखें नम हो गयीं । सुहासिनी ने अपना हाथ पति के काँधे पर रखकर दबाया जैसे कह रही हो बस भूल जाओ वो सब और कहा घंटी दबाओ । मन पर काबू पाते हुए देवदत्त ने बटन दबा दिया ।

हवेली की शान-ओ-शौकत अभी तलक उसी तरह कायम थी जिसके बाहर अभी भी दादी का नाम लिखा था 'लीला देवी दत्त' निवास ।

देवदत्त ने रेनोवेशन के वक़्त ख़ुद खड़े हो कर अपने सामने बनवाया था ।

दरवाजा खुला ----कोटिलया भाभी सामने खड़ी थी

पाँव छू, दोनों बड़ा सा आँगन लाँघ ड्रॉइंग रूम में पहुंचे जहां भाई लक्ष्मी दत्त के साथ माँ कृष्णा देवी दत्त, शाही ठाट के साथ बैठीं थी । भाई लक्ष्मी दत्त ने देवदत्त को गले लगाया । सुहासिनी ने पाँव छू अपनी जगह ली ।

देव ऐसा क्या हुआ ? बिना भूमिका बांधे भाई लक्ष्मी ने एक सवाल दाग दिया ।

कोटिलया बीच में ही बोल उठी -- अजी आप हद करते हो देवर जी को चाय पानी तो पूछा नहीं और शुरू हो गए । 

पत्नी की बात सुन लक्ष्मी दत्त ने बात टाल कहा-- मैने तो यूँ ही पूछा आप चाय पानी इंतजाम करो न ।

कोटिलया ने देवरानी सुहासिनी को इशारा कर, अपने साथ बाहर ले आयी । नॉकर दयाल को चाय पानी पर लगा सुहासिनी को अपने कमरे में ले आयी ।

कमरे में आते ही सुहासिनी बोली ---भाभी पुराने दिन याद आ गए । ऐसे ही तुम मुझे कठिन परिस्तिथियों से बाहर निकाला करती थी ।

मेरा तो दम घुटा जाता है इन दोनों के बीच चलती बातचीत  में । ---सुहासिनी ने फिर कहा ।

मैं समझती हूँ सुहासिनी ! तभी तो ले आई --- कोटिलया ने कहा ।

बच्चे कहां हैं भाभी ।

सुधीर तो बाहर गया अपने काम के सिलसिले में । बहु देविका को इस बार साथ ही ले गया है कहता कि  इसे भी घुमा लाता हूँ ।

कबीर का तो तुम्हें पता है क्रिकेट से उसे फुरसत ही नहीं मिलती ।
बहु रीना कॉलेज गयी है । आज कोई स्पेशल लेक्चर देना था उसे ।

"और कृतिका ? वो कहां है ?" ---सुहासिनी ने बेटी के बारे में पूछा ।

वो~~~~~
मंगनी हो गयी है न । शर्माती है सामने आने से ---इसलिए तुम्हें देखते ही ऊपर जाकर टी वी देख रही होगी ।---कोटिलया ने कहा ।

फिर एक दम असल बात पे आते हुए कोटिलया ने पूछा--- बात क्या है कुछ बताओगी भी ?

जेठ जी ने तुम्हें बताया नहीं  कुछ?

तुम भी अजीब बात करती हो । ये कभी बात करते हैं क्या ?

बस यही बताया कि देवर जी का फ़ोन आया है कि आ रहे हैं और आपका ऊपर का बंद पोर्शन की साफ़ सफाई करवा दी उन्होंने लेबर बुलाकर । अब पूछने की हिम्मत कौन करे । इन दोनों के बीच बोलना खतरे से खाली तो कभी था ही नहीं ।

कोई बात नहीं की ?

"नहीं" --तुम बताओ तफसील से क्या हुआ कोटिलया ने फिर पूछा ।

सुहासिनी ने अपने बेटे राजेश की सारी बात बता, कोटिलया से कहा कि --मैंने बहुत मना किया इन्हें ---लेकिन इन्होंने मेरी एक न सुनी । बहु बेटे के बाज़ार से लौटने से पहले ही वहां से मुझे साथ ले जल्द निकल लिए और जेठ जी को फ़ोन लगा दिया ।

राजेश का फ़ोन आया था क्या ?----सुहासिनी ने उत्सुकता से पूछा ।

हाँ !! आया था ।

जैसे देवर जी ने कहा था ---इन्होंने वही बता दिया, कि दादी को इमरजेंसी में हॉस्पिटल भर्ती कराना पड़ा । ----कोटिलया बोली ।

वो क्या बोला ?

आने के लिए कह रहा था । इन्होंने मना कर दिया । अभी ऐसी कोई बात नहीं है ।-- कोटिलया ने बताया ।

अंदर से यकायक जोर जोर से आवाजें आना शुरू ही गई । दोनों अंदर की और दौड़ी ।

जेठ जी देवर पर गुस्सा हो बोल रहे थे । तुम्हें कम से कम बेटे राजेश से बात तो करनी चाहिए थी ? बहुत समझदार और फर्माबदार लड़का है । उसके मन में क्या है पूछना तो था न ?

तुम्हें मालूम है ?
सुधीर और कबीर दोनों कोई भी काम उसकी सलाह के बिना नहीं करते ।

लेकिन भाई साहब उसने हमारे लिए उस नए मकान में कोई कमरा रखा ही नहीं ?---देवदत्त ने इस बात पे जोर देते हुए कहा ।

लक्ष्मी दत्त ने बीच में ही बोलते हुए कहा----समझ तो मुझे भी कुछ नहीं आ रहा लेकिन ज़रूर हो सकता है देव, इसमें भी कोई राज़ हो । जब तक पूछोगे नहीं तो पता कैसे चलेगा ?
तुम्हारी इसी चुप रहने की आदत ने तुम्हें बाऊ जी से भी दूर कर दिया था ।

लेकिन भाई साहब आप जानते हो गलत मैं तब भी नहीं था ।

हाँ देव !! गलत नहीं थे तुम !!--मैं ही जानता हूँ । शुरू से पाक दिल रहे हो तभी मेरे चहेते रहे हो । लेकिन तुम्हारी ये चुप्पी का फ़ायदा सभी उठाते गए ।

लेकिन भाई साहब--देवदत्त बोलते बोलते रुक गए ।

बोलो बोलो देव क्या कहना चाहते हो ?

आप चाहते तो ये सब नहीं होता  ।

अपने आप को संवारते हुए लक्ष्मी दत्त ने लंबी सांस ली और कहा---हाँ सच कह रहे हो देव । आज मुझे महसूस होता है घर के सबसे बड़े की अहमियत क्या होती है । घर बनाने में भी और ......।

(और उठ कर देव के गले लग गए । दोनों की आंखे नम हो गयीं ।)

मेरे थोड़े से स्वार्थ ने मुझे चुप रहने को मजबूर कर दिया था ।--लक्ष्मी दत्त  कहता चला गया --- तूने हमेशा ही हर किसी के लिए सेक्रिफाईस किया ।
राधा/कमला/संतोष तीनों बहिनें हमेशा तेरी ही बात को आगे बढ़ाती रहीं । मुझे हमेशा ये अखरता था ।

लेकिन बाऊ जी?---"देव बीच में ही बोल उठा ।"---बाऊ जी तुम्हारी बात पर ही चला करते थे ।

हाँ -- मैं मानता हूँ । मुझे लालच आ गया था बच्चों की वजह से ।

बच्चे बड़े हो रहे थे । हवेली के छोटे छोटे हिस्से क्या करते ? --"लक्ष्मी दत्त ने फिर कहा" ----
उस दिन--- अगर मैं तुम्हें रोक लेता तो आज तुम सब इसी हवेली में हमारे साथ होते ।

भाई साहब !! मुझे ये ग़म नहीं के हम साथ नहीं ।
मुझे ग़म इस बात का है बाऊ जी के मन में मेरे लिए ज़ह्र आख़िरी वक़्त तक भी नहीं धुल पाया ।

नहीं देव ऐसी बात नहीं । तुम्हारे कहने पर बाऊजी ने उनको (बहनों को ) भी हवेली के हिस्से दिए थे जो वो परंपरा के चलते नहीं चाहते थे ।

क्यूँकि तुम नहीं चाहते थे -- देव सच्चाई उगलता रहा ।

यही समझ लो ।

लक्ष्मी बात को पूरी करते हुये----बाऊ जी को तीनों बहिनों ने मिल कर ख़ुद अपने-अपने हिस्से सरेंडर किये और उसके बाद हम चारों ने बाऊ जी से बात की । वो चाहते थे कि तुम वापिस आ जाओ । लेकिन तुमने हमसे कोई भी कांटेक्ट नहीं रखा । फिर वह कॅरोना सब कुछ लील गया ।

आज फ़िर तुम्हें कहता हूँ अपने बेटे राजेश के मामले में चुप नहीं रहना । बात करो उससे ।----लक्ष्मी दत्त ने जोर देते हुए कहा ।

देवदत्त, भाई लक्ष्मी दत्त की कही "चुप्पी वाली बात"  पर सोचने पर मजबूर हो गए । ये बात दिल पर जैसे वार कर गयी ।

देवदत्त, सन्न हो, सोच में डूबता चला गया ।

हर्ष महाजन
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क्रमश:

भाग-3
प्रकाशित हो चुका है । आपका  इन्तज़ार रहेगा ।


Thursday, June 24, 2021

बैडरूम (भाग-1)

बाबू जी आपकी बहूत इज़्ज़त करता हूँ । सब कुछ आपका ही तो है राजेश ने अपनी बात रखते हुए कहा :--


आइये आगे देखते हैं :-


           राजेश जैसे ही आफ़िस से घर पहुँचा, उसकी पत्नी कामिनी ने अपनी बाई को आवाज़ लगा कर कहा - 'प्रिया' साहब के लिए चाय लेकर आओ और राजेश से बोली - आप फ्रेश हो लीजिये मैं टेबल पर  चाय लगवाती हूँ। 

     

          पिंटू पापा के आते ही उससे चिपट गया । पापा चाकलेट लाये हो ? राजेश ने जेब से दो चाकलेट निकाल कर उसे दे दीं ।


वो खुशी खुशी लेकर बाहर चला गया ।


    राजेश बैग हाथ में लिए हुए थोड़ा रुका और सामने बरामदे में आराम कुर्सी पर अख़बार का आनंद ले रहे अपने पिता की ओर मुख़ातिब हो बोला --- 'बाबू जी' आप जल्दी से तैयार हो जाओ आज कोठी पर चलना है सब तैयारी हो चुकी हैं । कोई कमी अगर रह गयी हो तो शिफ्ट होने से पहले ही देख़ लेते हैं बाद में दिक्कत होगी ।


बाबू जी उतावले हो बोले - अभी?


हाँ बाबू जी -- "राजेश ने खुशी खुशी कहा "।   

फिर कहा-- अभी तीन दिन की छुट्टियाँ पारित हुई हैं, आगे छुट्टियाँ नहीं मिल पायेंगी  और कामिनी भी कुछ दिनों के लिए अपनी मम्मी के पास इंदौर जाना चाहती है । इसलिए सोचता हूँ कल ही शिफ्ट कर लें । मूवर्स एंड पैकर्स से बात हो गयी है कल वो सुबह आ जायेगा ।


हद है ?--- "बाबू जी बोले"


अभी तुमने कहा कोठी देखने जाना है उसमें कोई कमी न हो और अगर कोई कमी निकल आयी तो ?-- "बाबू जी ने असमंजस में होते हुए कहा"


राजेश बोला-----वैसे तो बाबू जी कोई कमी निकलेगी नहीं । अलबत्ता अगर कोई बड़ी कमी निकल भी आई तो देख़ लेंगे । मूवर्स एंड पैकर्स वाला अपना ही आदमी है दिन बदल लेंगे ।


इतने में प्रिया चाय ले आयी और सभी डाइनिंग टेबल पर  आ गए  । इधर-उधर देखता हुआ राजेश बोला-मम्मी किधर है नज़र नहीं आ रहीं ?


बेटा वो मालती (पडौसन) के यहाँ पोता हुआ है न--- उसे देखने गयी है बस आती ही होगी ।


अभी इतना कहना ही था माँ सुहासिनी गेट से अंदर दाख़िल हुई ।


माँ को देखते ही राजेश ने कोठी देखने जाने की बात कही ।


ये सुन सुहासिनी ने अपने पति देवदत्त की ओर देखा । उन्होंने सर हिलाते हुए समझा दिया जैसे सब बात हो चुकी है ।


     चाय से फ़ारग हो वो सभी कोठी को देखने गए । उनके घर से वो 45 किलोमीटर थी । सभी बड़े ख़ुश थे ।


राजेश ने गाड़ी कोठी के ठीक एकदम सामने गेट के सामने रोकी । सबसे पहले राजेश के पिता देवदत्त गाड़ी से उतरे । सामने खड़े हो कोठी को निहारने लगे । कहा तो कुछ नही पर अंदर ही अंदर बेटे की पसंद की दाद देने लगे । गेट की दीवार पर एक छोटे संगमरमर के पत्थर पर लिखे नाम को देखा "कृश्णा देवी दत्त निवास" तो मन अंदर से प्रफुल्लित था । दादी का वर्चस्व अभी तक कायम था । हालांकि आजकल वो देवदत्त के बड़े भाई  लक्ष्मी दत्त के पास रह रही थी ।


माँ सुहासिनी तो जैसे फूली नहीं समा रही थी और बोल उठी अब आएगा न रहने का मजा । पड़ोसियों को ज़रूर बुलाएंगे एक दिन --- बड़ी अपनी अपनी हाँका करतीं थीं ।

       सुहासिनी ने अपनी सभी ग्रह प्रवेश की विधियां पूरी कर, घर के अंदर प्रवेश किया । अंदर घुसते ही दायीं तरफ उसे मन्दिर दिखाई दिया । माँ तो जैसे---- उसे सब कुछ ही मिल गया । सुंदर मूर्तियों से सुसज्जित ....


सुहासिनी तो बस भाव विभोर हो गयी ।


पिंटू इधर-उधर उछल कूद करने लगा ।


राजेश ने माँ को इतना खुश देख

कामिनी की तारीफ करते हुए कहा .....ये सब कामिनी ने ही जोर देकर बनवाया कि माँ के लिए हमारी तरफ से तौफा होगा ।


सुहासिनी ने कामिनी को प्यार से देखते हुए कोटि-कोटि दुआएं दीं ।


और अंदर दाखिल होते हुए सब लोग आँगन से होते हुए बाकी जगह देखने लगे । राजेश ने माँ और बाबू जी को अपना बैडरूम दिखाया जिसमें डबल बैड,  उस पर करीने से बिछी चादर ।


पलंग के पीछे की दीवार पर राजेश और कामिनी की शादी की बहुत बड़ी तस्वीर । 


सब मिलाकर कमरा बहुत ही सुंदर लग रहा था ।


राजेश ने अपने बैड रूम के आगे बने डाईंग रूम में प्रवेश किया । इतना बड़ा ड्राइंग रूम?---माँ बोल उठी ।


"हाँ माँ"----राजेश एकदम बोल उठा ।---"आजकल ऐसा ही बनता है ।"


डाईंग रूम में पाँच छः कुर्सियाँ पड़ीं थी । उनकी तरफ इशारा करते हुए राजेश ने कहा---बाबू जी आप सब यहाँ बैठो में अभी कुछ मीठा लेकर आता हूँ ।


 कामिनी राजेश को आवाज़ लगाते हुए बोली --मैं भी साथ चलती हूँ । तुम्हें कुछ नही पता चलेगा । 


माँ बड़ी खुश नजर आ रही थी और कुर्सी पर बैठते हुए बोली-- अजी सुनते हो ?

देवदत्त ने सुहासिनी की ओर देखते हुए कहा --- 'हाँ सुहासिनी'  ---एक लंबी साँस लेते हुए देवदत्त बोले---मंदिर तो बड़ा ही जबरदस्त बना है सुहासिनी, लेकिन !!


लेकिन? ---सुहासिनी ने आश्चर्य चकित हो पूछा ।---लेकिन क्या ??


'सुहासिनी'----फिर एक लंबी साँस लेते हुए देवदत्त ने कहा---मंदिर तो बहुत खूबसूरत बना है लेकिन-- हमारा बैड रूम कहाँ बना ?


"बैड रूम ?" - सुहासिनी को ऐसे  लगा जैसे  शरीर में 440 वाट का एक दम करंट सा दौड़ गया हो ।


हाँ--सुहासिनी--- हमारा बैडरूम

कहते हुए देवदत्त बहुत ग़मगीन थे ।


सुहासिनी कुर्सी पर बैठी सन्न सी एक टक देवदत्त की ओर देखती रह गयी । आँखों से दो मोती धीरे से लुढकते हुए उसके आँचल में आ गिरे । 


~ हर्ष महाजन ~


भाग-2

प्रकाशित ही चुका है देखिएगा ज़रूर >