दीपक और सुमित की दोस्ती की मिसाल अक्सर लोगों को साथ रहने की शिक्षा दिया करती थी ।
वो गहरे दोस्त थे औऱ रोज शाम को गांव के विभिन्न दोस्तों के बीच इकट्ठे चौपाल पर बैठ मन की बातें कर लिया करते थे ।
एक दिन एक मामूली सी बात के विवाद ने उनके बीच एक दीवार खड़ी कर दी।
उस शाम, गुस्से में भरे दीपक ने चौपाल में बैठे अपने कुछ साझा दोस्तों के बीच सुमित की पुरानी कमियों का मजाक उड़ा दिया और कुछ ऐसी बातें भी कह दीं जो उसने सुमित के पीठ पीछे सुनी थीं।
दीपक को लगा ये बातें सुमित तक कभी नहीं पहुँचेंगी ।
कुछ दिनों बाद, वे दोनों एक सामाजिक समारोह में आमने-सामने हो गए । दीपक ने तंज कसते हुए सुमित से कुछ कहना चाहा, लेकिन उस वक़्त सुमित की आँखों में एक अजीब सी खामोशी छा गयी । वो हैरान था ।
अनकहे शब्दों के शोर ने सुमित के मस्तिष्क में हलचल सी मचा दी थी ।
कुछ देर बाद सुमित, दीपक के करीब आया और उससे शांत आवाज में बोला- "दीपक ? तुमने आज जो मुझे मेरे सामने ही ये तंज कसा वो तो मैं बर्दाश्त कर गया, लेकिन जो तुमने उस दिन मेरे पीठ पीछे कहा , वो मुझे ज्यादा चुभ गया।"
दीपक का रंग सफेद पड़ गया । सुमित आगे फिर बोला-
"हैरानी तो इस बात की है कि तुमने वो बातें भी सच मान लीं जो मैंने कभी कही ही नहीं ।"
इतना सुन दीपक सन्न रह गया । उसे एहसास हो चुका था कि उसकी 'बैक-बाइटिंग' और गुस्से में बोले गए शब्द न केवल सुमित तक पहुँच चुके थे, बल्कि वे अब एक ऐसा 'यथार्थ' बन कर ऐसा घाव कर गए, जिसे मिटा पाना या भर पाना मुमकिन नहीं था।
वह भूल गया था कि नाराजगी में कहे गए शब्द अक्सर अपने ठिकाने तक पहुँचने का रास्ता खुद ढूंढ लेते हैं।
उस दिन दीपक ने पता नहीं इस झटके से कुछ सीखा या नहीं ।
लेकिन उसे इतना महसूस हो चुका था कि शब्दों के घाव का कोई मरहम नहीं होता ।
■■■समाप्त■■■
No comments:
Post a Comment