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Friday, July 9, 2021

वार्ड नंबर 23

 



            उस दिन राजेश जल्दी में था तो नाश्ता छोड़ ऑटो लेकर वो नई दिल्ली स्टेशन पहुँचा, भागते हुए ट्रैन पकड़ ही ली । आज ड्यूटी पानीपत लगी थी ।

सीट मिलते ही भूख की तरफ ध्यान गया ।

ट्रैन में कोल्ड ड्रिंक बेचले वाले की आवाज़ धीरे-धीरे पास आने लगी । हर माल मिलेगा 10 रुपैया , हर माल मिलेगा 10 रुपैया । हमारे कम्पार्टमेंट में आते ही उसने उसे आवाज़ दी - ए कैम्पा ? 

राजेश ने एक फैंटा औऱ दो वेफर्स के पैकेट लिए औऱ 10-10 के तीन नॉट दिए ।

"क्या बाऊजी आप भी न !! पहली बार इस गाड़ी मा बैठे हो का" -- मुस्कराता हुआ वो वेंडर फिर उसे बोला ।----"10 रुपैया में भी कोई चीज़ आता है का ?"

      साथ में बैठे हुए पैसेंजर भी सभी हँस पड़े औऱ जिस-जिस ने जो लिया उसके वो बिना पूछे पैसे भी देते जा रहे थे और वो वेंडर आराम से बिना कुछ कहे लेता भी जा रहा था ।

राजेश ने उसे कहा तू खुद ही तो आवाज़ लगा रहा था हर माल मिलेगा 10 - 10  रुपये ?

वो मजाकिया अंदाज में बोला - बाऊजी ऐसा नहीं बोलेंगे तो आप जैसे लोग बुलायेंगे कैसे ??

"अच्छा कितने पैसे हुए बताओ ?" --राजेश ने पूछा ।

"साहब 70 रुपैया दे दो बस?"- उसने लापरवाही से कहा ।

राजेश ने उसे 70 रुपये दिए और वो चला गया ।

भूख लगी थी सो राजेश जल्दी-जल्दी फैंटा के साथ वेफर्स खाने लगा ।

थोड़ी देर के सफ़र के बाद साथ बैठे हुए शख्स ने पूछ ही लिया -- क्या आप पहली बार इस गाड़ी में चल रहे हो?

हाँ में सर हिलाते हुए राजेश ने उसे भी शालीनता से वेफर्स आगे करते हुए, भी पूछ लिया ।

उसने हाथ से,उसके  हाथ को पीछे करते हुए मना किया  -- नहीं आप खाइये ।

उसने फिर बताया ये राजू था जिससे आपने ये खाने का सामान लिया है । ये किसी अमीर बाप की औलाद है । एम.बी.ए है ।

        ये सुन राजेश को जैसे झटका सा लगा । उसके हाथ में पकड़े वेफर्स मुँह तक न पहुँच पाए और उससे वापिस पूछ लिया ।

एम.बी.ए ?? यहॉं कैसे पहुँच गया ये?- राजेश ने उत्सुकता वंश पूछा ।

"बेरोजगारी इसे यहॉं ले आयी" - उस शख्स ने कहा औऱ आगे बताने लगा --
       एक दिन राजू फ़ुर्सत में था औऱ गाड़ी में पैसेंजर भी बहुत कम थे तो उसने अपनी बर्बादी की कहानी अपनी ज़ुबानी हमको सुनाई थी ।

इसको बचपन से नंबर गेम बहुत पसन्द था।  उस दिन उसने कहा:-

             23 नंबर का मेरी ज़िंदगी में बहुत महत्व रहा है औऱ वार्ड नंबर 23 का तो कुछ खास ही महत्व रहा था ।  जहां पर मेरी ज़िन्दगी ही बदल गई ।
   मेरे साथ जब-जब नंबर 23 का खेल चला  तो माँ ने भी मुझे बताया कि मेरा जन्म भी (लंबी सांस लेते हुए) वार्ड नंबर 23 में ही हुआ ।  सोचो तो-- ज़िन्दगी की शुरुआत यहीं से हुई । उस वक़्त पँजाब के बीचों-बीच पटियाला शहर के ब्लॉक 23 में हनारी रिहाईश रही ।
               रोड के साथ लगने के कारण हमारे निगम में भी खास अहमियत रही । मगर, जितनी इस वार्ड की अहमियत राजनीति कारों को थी उतनी मेरे लिए भी क्यूँकि ये भी वार्ड नंबर 23 में ही पड़ता था मेरा फ़ेवरिट नंबर-23  । लेकिन यह वार्ड उतना ही अविकसित भी था । वार्ड में आने पर ऐसा लगता था जैसे यहॉं के लोग अनदेखी का शिकार थे ।
         स्कूल में भी रोल नंबर 23 रहा । जब ग्याहरवीं का बोर्ड का इम्तिहान हुआ तो भी आखिरी दो डिजिट 23 ही रहे । रोल नंबर 29023 था ।
आगे की पढ़ाई दिल्ली में हुई । इत्तफ़ाक़ देखो खालसा कॉलेज में एडमिशन हुआ तो 23 जुलाई को ही फीस जमा हुई ।
जब कॉलेज आना जाना शुरू हुआ तो बस नंबर  23 सीधे इंद्रपुरी से मोरिस नगर खालसा कालेज जाया करती थी ।
मेरी मोटर साइकिल का नंबर भी यही निकला  DHY 23 ..
जब इतना कुछ कुदरत द्वारा ही होने लगा तो मेरी दिलचस्पी भी इसमें ही होने लगी ।
अब जो भी चीज़ लेनी होती तो दिलचस्पी 23 नंबर में ही होने लगी ।
एक दिन लाटरी का टिकट खरीदा ।  उस पर नंबर देखा तो वो भी 23.
सोचा कि देखते हैं कि लाटरी लगती है कि नहीं ?
ये सोच दिलचस्पी औऱ भी बढ़ गयी ।
रिजल्ट आया तो 1 करोड़ की लॉटरी मेरे नाम निकली । मन में कई अरमान पल रही थी सोचा पूरे लूँगा ।
             अब तलक मैं एम.बी.ए की पढ़ाई पूरी कर चुका था । लाटरी ने मेरा दिमाग एक दम बदल दिया था । अच्छी अच्छी कंपनियों की नॉकरी मैंने ठुकरा दी थी ।

          अब तक मुझे ये अहसास होने लगा था कि नंबर 23 मेरी जिंदगी का अब अहम हिस्सा है । अब मुझे ओर कुछ बड़ा करना है इसी धुन में दिन बीतने लगे ।

मैंने अपनी ज़िंदगी का रुख़ अब 'घोड़ों की रेस' की ओर मोड़ दिया ।
धीरे-धीरे मैं बर्बाद होता चला गया । यहॉं तक कि अब घर से पैसे मिलने भी बंद हो गये । पिता जी तो बहुत ही ख़फ़ा हो गए थे । मुझे देखते ही आग बबूला हो जाते थे ।
रेस का चस्का ऐसा लगा कि उधार इतना हो गया कि अब जूते पड़ने की नोबत आ गयी । पिता की गुडविल की वजह से जिन्होंने मुझे उधार दिया । अब वो तकाज़ा करने घर पहुंचने लगे ।
         आख़िर पिता जी ने एक दिन अचानक मुझे घर से निकाल दिया । घर से निकाले जाने का मुझे
इतना सदमा लगा कि मैं वो सह न सका ।

         उसके बाद का कुछ अर्सा मेरी यादाश्त से ही बाहर हो गया । जब मुझे अपने आप का अहसास होना शुरू हुआ तो मैंने अपने आपको आगरा के मानसिक अस्पताल में पाया । जिसे आओ लोग पागल खाना कहते हैं ।

                    देखो न !! वहां भी नंबर 23 ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा । मैं जहाँ दाख़िल था ! उसका नाम वार्ड नंबर 23 था । ये वार्ड उस अस्पताल का सबसे खतरनाक वार्ड था । चार साल वहाँ रहा ।
वहॉं भी मेरे कुछ दोस्त बने जो धीरे-धीरे ठीक हो रहे थे ।
जिस दिन मुझे छुट्टी मिली और मैं अस्पताल से बाहर आया तो मेरी दुनियाँ बदल चुकी थी । मैं बिल्कुल अकेला था । मेरे पास अब वही सामान था जो मुझे दाख़िल करते वक़्त जमा हुआ होगा । पैसों के नाम पर कुल तेहरह सौ रुपये ।

सवाल ये था कि कहाँ जाऊँ ? इसी धुन में में स्टेशन पहुँचा । अभी सोच ही रहा था किधर जाऊँ ?

चलते-चलते एक कुली से टकरा गया । उसने भी चलते चलते कहा भाई देख़ के चलो औऱ आगे बढ़ गया । मैंने उसे आवाज़ लगाई - हे भाई !

आवाज सुन वो पीछे मुड़ा औऱ बोला खाली नही हूँ। मैंने उसे रोका । मेरी नज़र उसके टोकन बैज पर पड़ी । फिर इत्तफ़ाक़ देखो वो भी नम्बर 23.
मैंने उसे आने साथ काम लगाने के लिए पूछा । उसने मना करते हुए कहा दिया कि अब कहाँ है साहब । बहुत मुश्किल है । कोई जगह खाली नही है पर मैं काम के लिए आपकी हेल्प कर सकता हूँ।
वो मुझे ले ताज एक्सप्रेस में चढ़ गया ।
उस गाड़ी में एक बुजुर्ग था जो चाय- चाय की आवाज़ लगा रहा था । उसके साथ उसने मिलवाया । उसकी सिफारिश से अब मैं यहॉं हूँ ।

लेकिन नंबर 23 जब जब मेरी ज़िंदगी में खुद आया तो फायदा हुआ लेकिन मैंने जब चाह कर लाने की कोशिश की तो बर्बाद हो गया ।

तभी दोस्त में हमेशा यही बोलता हूँ -- हर माल मिलेगा 10 रुपैया - हर माल मिलेगा 10 रुपैया ।

इतने में गाड़ी रुकी --सामने देखा तो पानीपत ।

राजेश ने अपना बैग उठाया और ट्रेन से नीचे उतरते हुए देख रहा था कि राजू भी साथ वाले डिब्बे से नीचे उतरा । 

राजेश की उससे बात करने की इच्छा थी । इसलिए उसे आवाज़ लगाई ।
वो पास आया तो राजेश ने  पूछा--- राजू ! तुम्हारा असली नाम क्या है ?

राजू ने हंसते हुए जवाब दिया-- राजू ही है सर !!
यही नाम है ।

ज़ोर देने पर राजू दर्द महसूस करते हुए बोला--राजू ही रहने दो साहब । अगर असल नाम बाहर आया तो दिल्ली शहर का बहुत बड़ा नाम बदनाम हो जाएगा सर ।

जाने दो -जाने दो !!

फिर मुलाकात होगी उसी ट्रैन में ।--राजू कहता हुआ और हाथ से बाय-बाय करता हुआ दूर निकल गया ।

--हर्ष महाजन

◆◆◆◆


फिर वो अज़नबी कौन था ?

 

     फिर वो अज़नबी कौन था !!

          उस दिन राजेश बहुत खुश था । उसकी शादी की पांचवी साल गिरह थी । घर में एक छोटा सा फंक्शन रखा था इसलिये उसने सोचा आफिस (बैंक) से जल्दी घर लौट कर पत्नी कामनी के काम में कुछ मदद कर दूँगा ।





अपने बोस से आज्ञा ले, खर्चे के लिए उसने अपने अकाउंट से पाँच हज़ार निकलवाये औऱ बैंक से बाहर निकल गया ।

      अपनी गाड़ी निकाली और  घर की ओर रवाना हो चला । ख्यालों में मस्त--कॉलेज के दिनों के उन दोस्तों को आज उसे मिलना था जो कभी उसके हमनशीं औऱ हमबगल हुआ करते थे ।

बहुत खुश था वो जल्दी से घर पहुंचना चाहता था ।

घर के नज़दीक वाली आख़री लाल बत्ती के पास भीड़ देख ठिठक गया । उसने गाड़ी थोड़ी धीमी कर ली थी । शायद कोई एक्सीडेंट हुआ था । कुछ पल के लिए उसने गाड़ी रोकी । लेकिन अगले ही पल ये सोच कि खामखाँ घर लेट हो जाऊँगा उसने गाड़ी को आगे बढ़ा दिया ।

घर पहुँच उसने गाड़ी खड़ी की औऱ अंदर पहुँचा, वहाँ तैयारी अभी आधी अधूरी ही थी ।

माँ बाबूजी दोस्त यार कुछ नज़दीकी रिश्तेदार सब एक दूसरे से बतिया रहे थे । सब खुश थे । उसने माँ से पूछा- 'माँ कामनी कहाँ है ? सारा काम पड़ा है कहीं दिखाई नहीं दे रही ।"

"वो बेटा -- केक लेने गयी है, बोल रही थी आफिस से आकर तुम कहाँ भागते फ़िरोगे" -- माँ सुहासिनी ने मुस्कुराते हुए फट से जवाब दिया ।

ये सुन मुस्कुराते हुए सोचने लगा कि चलो ये भी अच्छा हुआ कामिनी ने ये काम भी निपटा दिया औऱ टेबल को आँगन में खिसकाने लगा । साथ में राजेश का दोस्त हरि भी साथ देने लगा  ।

इस बीच राजेश का मोबाइल दो बार बजा लेकिन बिना देखे काल बंद कर रहा था  । अबकि बार फ़ोन बजा तो हरि ने बोला --- "यार बात कर लो न, कोई ज़रूरी काल भी तो हो सकती है ?"

घंटी फिर से बज उठी । इस बार घंटी बजी तो राजेश ने फ़ोन पर नंबर देखा तो बोला -- "ओए ये तो कामिनी का है"

फ़ोन  पिक कर जैसे ही हेलो बोला--उधर से एक अज़नबी औऱ भारी भरकम आवाज ने बड़े ही शालीनता से पूछा --- "आप राजेश जी बोल रहे हैं ?"

"आप कौन ? कामिनी कहाँ है ?" -- राजेश घबराया हुआ बोला औऱ कई प्रश्न दाग दिए ।

देखिये मैं  "आल इंडिया मेडिकल अस्पताल" से रमेश रोहतगी बोल रहा हूँ जिसका ये फ़ोन है उसका एक्सीडेंट हो गया है और वो यहाँ एम्स में दाख़िल है । मैंने उनके फ़ोन से ही आख़िरी काल को डायल कर दिया है । आप अगर इन्हें जानते हैं तो मेहरबानी कर के उनके किसी रिश्तेदार को  इन्फॉर्म कर दीजिए" ----उसने आग्रह किया ।

कामिनी के फ़ोन से एक अज़नबी इंसान की आवाज में,  ये सब सुन कर राजेश सुन्न हो कुछ बोल ही नहीं पाया ।

लड़खड़ाती आवाज में उसने बस यही कहा-- "हाँ मैं कामिनी का हस्बैंड बोल रहा हूँ  उनको~~~~।"

             हरि, राजेश को घबराते हुए बात करते देख उसने, उससे फ़ोन खींच लिया और उस अजनबी से बात की । उसने जो-जो बताया --- फ़ोन बंद कर,  माँ बाबूजी को सलीके से सुना दिया कि भाभी का छोटा सा एक्सिडेंट हुआ है  । बाबूजी को तसल्ली देते हुए कहा - " वैसे घबराने वाली कोई बात नहीं है, कामिनी भाभी ठीक है "

हरि के खुद के पैरों तले ज़मीन खिसक चुकी थी ।

            माँ, बाबूजी औऱ राजेश,  इन तीनों को लेकर हरि ने अपनी गाड़ी एम्स की ओर दौड़ा दी ।  राजेश को याद आ रहा था उसने अपने घर के नज़दीक वाली रेड लाइट पर एक एक्सीडेंट देखा तो था । रुका भी था । क्या वो कामिनी थी?  वो फिर खुद को कोसने लगा कि मुझे गाड़ी से उतर कर देखना चाहिए था यही सब बुदबुदाता जा रहा था ।

                 अस्पताल पहुँच, माँ बाबूजी को बाहर बिठा,  हरि औऱ राजेश सीधे इमरजेंसी विभाग पहुँचे । वहाँ पर सभी की ज़ुबाँ एक ही एक्सीडेंट की  चर्चा में थी । हरि सब समझ चुका था ।

पूछ ताछ कर उन्हें पता लगा कि कामिनी को आपरेशन थियेटर ले जाया जा चुका है ।

               राजेश के कान में वही भारी भरकम आवाज अभी तक बड़े ही जोरों से बज रही थी । कामिनी का फ़ोन उसी के पास था ।

उसके बारे में इधर-उधर पूछा तो किसी से कुछ मालूम न चला ।

तीन घंटे हो चुके थे ऑपेरशन चलते हुए । इतने में लाँज में कामिनी के नाम की अनाउंसमेंट हुई ।

हरि औऱ राजेश तेजी से काउंटर की ओर दौड़े ।

वहाँ से पता लगा कि ऑपरेशन ठीक-ठाक हो गया है । आप में से एक लोग पांचवे तल पर डाक्टर अमित से मिल सकते हैं इस के लिए ये स्लिप है ले लीजिये ।

जल्दी से राजेश औऱ हरि लिफ्ट की ओर भागे ।

लिफ्ट मैन से कुछ बातचीत कर दोनों ऊपर पहुंचे ।
डाक्टर से मुलाकात हुई - उन्होंने बताया कि पेशेंट अभी बेहोश है । 36 घंटे इंतज़ार करनी होगी ।
सर में 67 टाँके लगे हैं ।

राजेश ने बताया - "मैं कामिनी का हसबैंड हूँ ।"

डाक्टर ने बताया - 'ये तो अच्छा हुआ उनके भाई साहब एन वक़्त पे उन्हें यहॉं ले आये ।"

"उनके भाई ???---ये सुन चोंकते हुए दोनों हरि औऱ राजेश ने एक दूसरे की ओर देखा ।

"हाँ वो हैं न रमेश रोहतगी ?" - डाक्टर ने आगे
कहा -- "वो थे इसीलिए शायद उनके बचने के चाँस बने हुए हैं ।"

डाक्टर भी अपने इस कामयाब आपरेशन पर ख़ुश लग रहा था और आगे कहने लगा - सच बताएं तो, जैसे ही हमें ये पता चला कि आपकी पत्नी का ब्लड ग्रुप माइनस बी है,  हमारी तो हालत ही खराब हो गयी थी । ये ब्लड ग्रुप तो बहुत रेयर ग्रुप है । स्टॉक में भी नहीं था । सब ब्लड बैंक्स को लाइटनिंग कॉल भेजी गई ।"

डाक्टर ने फिर कहा---"रमेश रस्तोगी को पता चलते ही उन्होंने बताया चिंता न करें उसका ब्लड ग्रुप माइनस बी है उन्होंने  सारी ज़िम्मेवारी अपने ऊपर ले सारे फार्म भरे और देखिये न उनका रेयर ब्लड ग्रुप -बी (माइनस बी) जो मिलने की संभावना, न के बराबर ही होती है  डायरेक्ट कामिनी को चढ़ाना पड़ा ।"

"रोहतगी जी कहाँ हैं इस वक़्त?"--राजेश औऱ हरि ने उत्सुकता वंश दोनों ने इकट्ठे पूछा ।

"वो भी अभी अंदर ही हैं रिकवरी रूम में । उन्हें अभी आराम की सख्त जरूरत है । अपनी जान खतरे में डाल उन्होंने एक की जगह आधी यूनिट फालतू ब्लड लेने की इज़ाज़त दी ।" ---डाक्टर अमित ने बताया ।

ये ग्रुप अस्पताल में भी नहीं था ।

हरि औऱ राजेश कामिनी के साथ रमेश के अच्छा होने की दुआएं मांगने लगे ।

              अगले दिन रमेश रोहतगी को बाहर भेज दिया गया । एक 30 -- 35 साल का गोरा चिट्टा जवान ।   उसने एक्सीडेंट से लेकर अस्पताल का सफ़र कैसे सब विस्तार से बताया ।

                उसने बताया --- "कि वो तो बाई चांस उधर से गुज़र रहा था कि अचानक एक बहुत तेज़ मिनी बस एक लेडी को उड़ाती हुई निकल गयी । लेडी के हाथ में शायद केक था जो आसमान में उछला । मैं मोटर साइकिल पे था । पुलिस ने उसको गिरफ्तार तो कर लिया है ।"

रमेश अपनी मोटर साइकिल को लेने जाने की बात कह वहाँ से जाना चाहता था ।

अब हरि औऱ राजेश दोनों  हाथ जोड़े उसके आगे गए और समझ नही आ रहा था कि उनका अब कैसे धन्यवाद दें ----इस असमंझस को देख रमेश समझ गया ।

             वो  खुद आगे बढ़ा और उसने दोनों को तसल्ली दी कि उसने अपना फर्ज़ निभाया है । वो मेरी भी बहिन है अगर आप इज़ाज़त दें तो । मेरी कोई बहिन नहीं है उसे बहिन मान लूँ ।

राजेश की ऑंखें अश्क़ों से तरबतर हो गईं ।

उसने कहा मुझे अब उस रेड लाईट से अपनी मोटर साइकिल उठानी है , मैं अभी चलता हूँ------- 'फिर आता हूँ" -- ये कह के वो शख्स कामिनी का मोबाइल राजेश के हाथों में सौंप अलविदा कह--- हाथ हिलाता चला गया ।

                     पंद्रह दिन के ख़ौफ़ भरे दिन देखने के बाद  राजेश औऱ हरि कामिनी को लेकर अस्पताल से विदा होने के लिए बाहर आये ।

लेकिन वो शख्स (रमेश रोहतगी) इन 15 दिनों में एक बार भी अस्पताल नहीं आया ।

परेशानी में दिमाग इतना ख़राब कि उस शख्स से   उसका नंबर तक लेना भी वो भूल गए ।

अस्पताल का रिकॉर्ड देखा तो उसमें उसके एड्रेस की जगह उन्हीं का एड्रेस लिखा था ।

शायद कामिनी के फ़ोन से देख कर लिखवा दिया होगा। । ये सोच के अपने आप को तसल्ली दी कि उसने कामिनी को अपनी बहिन माना है तो शायद वो घर पर ज़रूर आएगा ।

कामिनी को ले हम घर पहुँचे ।

पांच छः दिन बाद शाम को चाय के वक़्त कामिनी भी सब के साथ कुर्सी पर बैठ गयी । अब कामिनी अच्छे से अपने भाव में आने लगी थी । साल गिरह का वो दिन सहसा ही याद आ लगा ।

एक्सीडेंट का वो पूरा सीन उसके मस्तिश्क पटल पर ऐसे घूम गया कि अचानक वो बोल उठी -- "बाबूजी वो बुजुर्ग कहाँ गया ? वो कौन था ?? जिसने मुझे गौद में लपका ?  मुझे ज़मीन पर गिरने नहीं दिया उसने ।"

सभी चोंक गए और हैरान होकर राजेश ने पूछा -- "कौन बुज़ुर्ग ??"

राजेश यही समझ रहा था कि वो शायद रमेश रोहतगी की बात कर रही है ।

कामिनी ने फिर वो सीन दोहराया--- " मैं जब केक लेकर लौट रही थी तो एक बस ने मुझे पीछे से जोर से टक्कर मारा और मैं आसमान की तरफ 10-12 फुट ऊपर उछली । जब मैं नीचे गिरने लगी तो वो बुज़ुर्ग जिसकी बहुत लंबी सफेद दाढ़ी थी सफेद पगड़ी औऱ सफेद कुर्ता पायजामा ।  उसने मुझे अपनी गोद में लपक लिया ।  बाबूजी मेरी एक नज़र उनके चेहरे पर पड़ी, क्या नूर था । उसके बाद मुझे क्या हुआ कुछ पता नहीं ।

लेकिन अब राजेश सोच में पड़ गया । ये अज़नबी अगर रमेश रोहतगी था तो उसकी दाढ़ी नहीं थी ।

राजेश की भौहें तन गईं औऱ सोचने लगा ।

फिर?

फिर वो अजनबी कौन  था ?

---हर्ष महाजन 'हर्ष'

◆◆◆◆


ज़िगरी दोस्त

 

जिगरी दोस्त
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"लाला एक पाव मसूर की दाल देना"-- हरि को एक सुरीली आवाज  आई ।

हरि अभी दुकान में झाड़-पोंछ कर ही रहा था सुबह सुबह--

पीछे मुड़ के देखा तो अपने मोहल्ले में ही काम करने वाली कान्ता सामने खड़ी थी ।

उसने इंतज़ार करने को बोल हरि ने काम निपटा, धूप बत्ती जलाई । उसे दाल तौल के दे दी । पैसे लिए -- माथे से लगाये और गल्ले में डाल दिये ।

और गद्दी पर आकर बैठ गया ।

सुबह कई ग्राहक यूँ छूट-पुट सामान लेने आते रहे । इतने में सामने की गली से एक बुजुर्ग एक छोटे बच्चे को जबर्दस्ती खींचता हुआ ला रहा था ।

पास आया तो पता लगा कि वो बच्चा शायद स्कूल न जाने की जिद्द कर रहा था

इतने में वो उसकी दुकान के नज़दीक आ गया । यहीं पर उसके रिक्शे ने आना था । रिक्शा जैसे ही आया बच्चा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा ।

आख़िर उस बुज़ुर्ग ने बच्चे से कहा- "बेटा पढ़ेगा तो बड़ा आदमी बनेगा न । नहीं तो मेरे जैसा ही बनेगा ?  या  फिर रेहड़ी  लगाएगा क्या ??"

नादान बच्चे को क्या मालूम कि वो क्या कह गए ।

वो बुज़ुर्ग उसको रिक्शा में बिठा चला गया ।

हरि अपनी पुरानी यादों में खोता चला गया । बुज़ुर्ग की बातें उसके मस्तिक्ष में छाने लगी ।
पुराने दिन--क्या मस्ती भरे दिन थे---हर विदा में  नाम था । क्रिकेट में अच्छा बॉलर था । आवाज़ इतनी अच्छी सभी दीवाने थे । पार्टियों में गाने गाकर छा जाया करता था ।

वर्ष 1973 -- वो ग्याहरवीं कक्षा में था ।
***********
उस दिन वो छत पर अपने बोर्ड के  इम्तिहान की तैयारी में मशगूल था कि अचानक उसका दोस्त राजेश साथ वाली छत से दीवार फाँद कर आया और बोला - "चल हरि खड़ा हो लिबर्टी पर बॉबी फ़िल्म लगी है । ताबड़ तोड़ फ़िल्म है सुना है बहुत ही बेहतरीन फ़िल्म है ।"

"नहीं यार"-- हरि ने मुँह बनाते हुए कहा--"इम्तिहान सर पे हैं मुझे कुछ नहीं आता । अब सब मटरगश्ती खत्म"

कह हरि फिर अपनी पढ़ाई में लग गया ।

राजेश ने उसे फिर कहा - "तू समझ नहीं रहा । मैं टिकट ले आया हूँ। बड़ी मुश्किल से मिली हैं । आजकल टिकट की ब्लैक चल रही है । लेकिन मैं तेरी खातिर ले आता हूँ।  तीन घंटे की ही तो बात है । फ़िल्म देख के सीधे घर ही आ जाएँगे । तुम आकर देर रात तक पढ़ लेना फिर । तेरा दिमाग तो अच्छा है ही"

दिमाग की बात तो तब होगी न जब मैं पढ़ूँगा ?

लेकिन हरि के मन में भी चोर जागने लगा और सोचने लगा कि बॉबी फ़िल्म दुबारा पता नहीं कब लगेगी । चलो देख ही लेते हैं ।

राजेश को अब चिढ़ होने लगी औऱ फिर बोला- "देख हरि ये दोस्ती है क्या? वक़्त पड़ने पर दगा दे तू ? चल उठ"

कह राजेश ने बांह से पकड़ उसे उठा दिया ।

फ़िल्म देख़ दोनों मस्ती मारते हुए रात गयारह बजे घर पहुँचे ।

आगे की तरह पिता जी से डाँट खाई और सो गया ।

अब ये सिलसिला होना उसके साथ आम सी बात थी । राजेश उसका जिगरी दोस्त था । उसकी बात टालने की उनकी कभी हिम्मत न हूई । राजेश भी कभी उसकी बात नहीं टालता था ।

इसी आपादापी में, वक़्त रेत की तरह हाथ से फिसलता जा रहा था । इम्तिहान की तैयारी पीछे छूटती जा रही थी ।

राजेश के पिता का तो बहुत ही बड़ा बिज़नेस था । कपड़े के जाने माने व्यापारी थे । पैसे की कोई कमी नहीं थी ।

कमी तो हरि को भी नहीं थी लेकिन फिज़ूल खर्ची से बचने की कोशिश करता था ।

इम्तिहान वाले दिन हरि बहुत घबराया हुआ था । वाणिज्य का इम्तिहान औऱ उसे ऐसा लगता था कि जैसे उसे कुछ नहीं आता था । छमाही इम्तिहान में  फेल होने जैसे ही नंबर आये थे । इस बार किसी तरह वो अच्छे नंबरों से पास होना चाहता था । पढ़ के वो कुछ बनना चाहता था । स्कूल जाते हुए  रास्ते में उसे राजेश मिला ।

उसने उसे समझाया - "घबराओ मत सब ठीक हो जायेगा ।"

राजेश का सेंटर दूसरे स्कूल में था । वो बेफिक्र सा अपनी साइकिल पर फर्राटे से निकल गया ।

किसी तरह इम्तिहान खत्म हो गए ।

2 जून 1973

उस दिल रिजल्ट आना था । स्कूल पहुंचे तो वहॉं भीड़ लगी थी । हरि एक तरफ खड़ा हो गया । दिल घबरा रहा था ।

अचानक पीछे से आवाज़ आयी -- "मुबारक हो भाई"

मुड़ के देखा तो उसकी  क्रिकेट की टीम का कप्तान राहुल था ।

उसके गले लग के उसने उसको भी बधाई दी ।

आगे बढ़ के उसने फिर ख़ुद अपना रिजल्ट देखा ।

वो पास था ।

लेकिन नंबर 54 प्रतिशत ही थे ।

वो सोच रहा था कि बिना पढ़े इतने नंबर आ गए । अगर पढ़ लेता तो अच्छे नंबर आ जाते ।

इंजीनिरिंग करने का ख्वाब पाला था उसने ।

शाम को राजेश मिला उसके 62 प्रतिशत मार्क्स थे । ये सुन हरि को अंदर से महसूस हुआ कि इसी की वजह से तो उसके नंबर कम आये थे ।

रात को उस दिन फिर दोस्तों ने जश्न मनाया । हरि के मन में ठेस थी । उसने कई पुराने ग़मगीन गाने सुनाए । लेकिन महफ़िल में फिर भी चार चांद लग गए ।

कॉलेजों के फार्म भरे जा रहे थे ।
बड़ी मशक्कत के बाद  तीसरी लिस्ट में साऊथ के एक कॉलेज "रामलाल आनंद कालेज"  में बी.काम (पास) स्ट्रीम में उसे एडमिशन मिल गया ।

राजेश को नार्थ के "खालसा कॉलेज" में बी.काम (आनर्स ) में एडमिशन मिल गया ।

दोनों ने कॉलेज जाना शुरू कर दिया । हुनर के चलते एक साल के भीतर-भीतर हरि का नाम कॉलेज के हर विद्यार्थी की ज़ुबाँ पे था ।

क्रिकेट के मैचों की वजह से फिर हरि औऱ राजेश की मुलाकातें होने लगीं । राजेश खालसा कालेज की टीम में सेलेक्ट हुआ था ।

हरि के प्रति उसके कॉलेज के विद्यार्थियों की निष्ठा देख़ अब राजेश को भी रश्क होने लगा । लेकिन वो ख़ुश था कि हरि की वजह से उसको भी लोग अब जानने लगे थे ।

अब कभी म्यूसिक की वजह से तो कभी क्रिकेट की वजह से, तो कभी कॉलेज के कई और क्रिया-कलापों की वजह से हरि के लेक्चर मिस होने लगे थे ।

इम्तिहान के दिनों में भी कभी-कभी मैच की प्रैक्टिस के लिए बुला लिया जाता ।

फिर रातों को देर रात तक पढ़ाई ।

वक़्त फिर हाथों से खिसकना शुरू हो गया । कोर्स ज़ियादा वक़्त कम । दिमाग अच्छा होते हुए कहाँ चूक ही रही थी हरि को ये सब समझ तो आता था लेकिन देखते देखते वक़्त खिसकता ही चला जाता था । 

न चाहते हुए भी पार्टियों  में उसे बुलाया जाना । क्योंकि उसके बिना पार्टियों में रौनक ही नहीं होती थी ।

कॉलेज में मशहूर होकर भी वो सब कुछ जैसे खोता चला गया ।

एक तरफ इतना आउट स्टैंडिंग स्टूडेंट के ढ़ेरों सर्टिफिकेट्स दूसरी तरफ स्टडी में गिरता ग्राफ ।

धीरे-धीरे कॉलेज के आखिरी साल औऱ आख़री महीनों में सभी स्टूडेंट अपनी अपनी पढ़ाई में व्यस्त होते चले गए । मिलना मिलाना कम होता गया ।

हरि ने सोचा था अब जाकर लेक्चररों से कुछ हेल्प ले लूंगा । लेकिन जब स्टूडेंट्स ने आना बंद कर दिया तो भी अब कम ही आते थे ।

धीरे-धीरे उसे वक़्त की नज़ाक़त का अहसास होने लगा था लेकिन बहुत देर हो चुकी थी।

फाइनल इम्तिहान हुए । फिर वही 54 परसेंट मार्क्स ।

राजेश बड़ा ख़ुश था 72% मार्क्स लेकर पास हुआ ।

इतने में जोर से हॉर्न की आवाज़ सुनाई दी वो (हरि) अपने ख्वाबों से अचानक बाहर निकला ।

उसकी दुकान के सामने एक बहुत बड़ी सफेद रंग की आड़ी गाड़ी आकर खड़ी हुई । बार-बार हॉर्न की आवाज ने हरि का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया  ।

दरवाजा खुला एक कोट पेंट में एक अंग्रेज की तरह इंसान बाहर आया । पहचानते देर नहीं लगी ।
वो राजेश ही था ।
दोनों बड़ी गर्म जोशी से मिले । हरि उसे आने घर ले गया । पुराने दिन याद करते हुए उन्होंने आज पार्टी देकर जश्न किया ।

लेकिन आज जश्न में वो मज़ा नहीं था जो उन दिनों आया करता था । आज दोनों ने शराब पी । दोनों की वजह अलग अलग थी ।

राजेश खुशी में पी रहा था  और हरि अपनी नाकामयाबी पर ।

फिर वह दर्द भरे नग्में ।

अपना गोल न पाने की कसक ।

पूछने पर----
राजेश ने बताया-कि कॉलेज करने के बाद वो अमेरिका चला गया । वहीं एम.एस. किया । थोड़ी देर जॉब की  । फैमिली को वहीं बुला लिया था । अब  वहीं पर  पापा का बिजनेस फल फूल रहा है मैं वही सब देख रहा हूँ ।

"तुम बताओ जैसे गुज़र रही है ?" --राजेश ने हरि के कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा ।

  मत पूछ दोस्त--मेरा वक़्त औऱ मेरा कॅरिअर रेत की तरह मुट्ठी से फिसलता ही चला गया । देख लो पापा की परचून की दुकान फर्राटे से चला रहा हूँ।

ये कह हरि ख़ुद ही जोर से हा हा हा कर हँसने लगा ।

लेकिन उसकी हँसी में उसकी रज़ा बिल्कुल भी शामिल नहीं थी ।

----हर्ष महाजन

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Friday, April 7, 2017

रात ग्यारह बजे ( एक लघु कथा )


रात ग्यारह बजे  (लघु कथा )

राजेश जैसे ही घर दाखिल हुआ, देखा सुषमा कान से फोन लगा चुपचाप खडी है जैसे दूसरी ओर से कोई बात कर रहा हो | खाना लगा दो बेगम ---कह वो अपने कमरे में कपडे बदलने चला गया | वापिस लौटा तो बेगम उसी तरह खडी मिली | उसने उसे पास जाकर हिलाया और पुछा क्या हुआ बेगम |

वह अचेतन अवस्था से बाहर आई तो उसे याद आया |

“तुम हमेशा से ऐसे करती आई हो | पापा भी बचपन से ऐसे ही पेश आते रहे हैं मुझसे | लगता है मैं तुम्हारी बेटी ही नहीं |” ---- कान में जैसे बम की आवाज़ हुई, सुषमा सन्न खडी की खडी रह गई काटो तो जैसे खून नहीं |

“कुछ नहीं बस ऐसे ही कुछ सोच रही थी | (कह , फोन क्रेडिल पर रख परेशान सी खाना परोसने हेतु रसोई में चली गयी )
इस बीच उसकी आखों के आगे आशु के जीवन का अब तक का सारा सफ़र गुज़र गया | उन्होंने अपनी यादाश्त के अनुसार उसके साथ कभी अन्याय नहीं होने दिया | अच्छे स्कूल में पढ़ाया, नम्बर कम होने के बावजूद अच्छे कालेज में डोनेशन देकर दाखिला दिलवाया | बैंक से लोन लेकर उसके पापा ने एम्०बी०ए० में दाखिला करवाया और उसी की पसंद के होनहार लड़के से शादी भी करवा दी | फिर ऐसी क्या बात थी जो आशु ने इतना सब कह दिया | खाना परोसते हुए वह नज़रे चुराती हुई जैसे ही मुड़ी राजेश समझ गया कि बेगम ज़रूर कुछ परेशान है | वो तो खाने की थाली परोस हमेशा साथ ही बैठ जाया करती थी | थाली एक तरफ कर बेगम को जैसे ही टोका – तो वो फफक पड़ी |
          उसी शाम जहाज़ की टिकट कटा दोनों बंगलौर पहुंचे | रात ग्यारह बज़ चुके थे | जैसे ही दूसरी मंजिल के फ़्लैट नम्बर २११ की घंटी बजाई, सुषमा बेहद घबराई और डरी हुई आँखों में खालीपन लिए राजेश के पीछे दुबक गयी | दिल जैसे बैठा जा रहा था,  | अपने ईष्ट को याद कर न जाने क्या-क्या सोचने लगी थी वो | राजेश ने एक हाथ से बैग थामे दूसरे हाथ से उसको सांत्वना देते, उसकी बाजू को दबाया | इतने में दरवाजा खुला – अंदर गुप अँधेरा और एक अजीब सा सन्नाटा | कोई शख्स दिखाई भी नहीं दिया | डर के मारे वो राजेश से चिपक सी गयी | दोनों शांत से धीरे-धीरे दरवाजे को धकेलते जैसे ही आगे बढे – एक काला साया लपका और दोनों को जकड  लिया | सुषमा की एक लम्बी चीख संग घर की सारी लाईटें जगमगा उठीं | सारा परिवार “राजेश और सुषमा” की सिल्वर जुबली के उपलक्ष में एकत्रित था, डी०जे० गूँज उठा और बधाइयों के बीच सभी थिरकने लगे | राजेश ने सुषमा को संभालते हुए अपने बैग से हीरों जड़ित वो हार निकाला और सुषमा के गले में पहनाते हुए तब तलक बाहों में भर खडा रहा जब तलक सुषमा की साँसे काबू में नहीं आ गयी |
रोते हुए सुषमा बस इतना ही बोल पाई --- राजेश तुम भी !!

____________हर्ष महाजन

                                     --: ० :----

Friday, May 1, 2015

कटी पतंग


  (कहानी)
हर्ष महाजन
प्रकाशित
1988
 

      कटी पतंग
                          
सुलेखा अपने घर का सारा काम काज निपटा कर दहलीज़ पर अपने बेटे को ले आ बैठी | यही समय होता था की वह थोडा आराम कर लिया करती थी | धूप सेकने का कुछ समय वह रोज़ निकाल लिया करती थी | आराम करते हुए वह अपने पति का स्वेटर भी आजकल बुन रही थी | बेटा राजू, जो इस समय आठवें साल से गुजर रहा था, अपने दोस्तों के साथ घर के आगे बने मैदान में पतंग उड़ाते हुए बच्चों को देख रहा था | वह कभी मैदान में पतंग उडाती हुई किसी एक टोली के पास खड़ा हो जाता तो कभी दूसरी | उसे पतंगों से इतना प्यार था की वह तब तक घर नहीं लौटता, जब तक आसमान में एक भी पतंग दिखाई देती |

               
   सुलेखा स्वेटर बुनते हुए अपने बच्चे को निहार रही थी और अपने भविष्य के सपनों में अपने बुदापे का सहारा देख रही थी | वह अपनी गुजरती ज़िन्दगी से बहुत ही खुश थी | उसका पति, घर से चार किलोमीटर दूर एक लक्कड़ काटने वाली फेक्टरी में काम करता था, जहाँ से उसे अच्छी तनख्वाह मिल जाती थी | घर परिवार का खर्च उठाकर वह दोनों बहुत सा हिस्सा बचा भी लिया करते थे | परिवार में तीन लोगों के इलावा और कोई भी नहीं था उनमें वो खुद , उसका पति, राम किशन और बेटा  राजू | पति रामकिशन बड़ा ईमानदार और मेहनती व्यक्ति था | उसका मालिक, जिसकी फेक्टरी में वह काम किया करता था रामकिशन के  काम से बहत खुश था इसलिए मालिक ने उसको गाज़ियाबाद के छोटे से गाँव, महाराजपुर में  दो कमरों का मकान रहने के लिए दे दिया था | इसकी वज़ह से उसकी आर्थिक स्थिति काफी मज़बूत हो गई थी | उनकी सम्पन्नता देखकर आसपास की पडौसन उससे जला करती थीं | इसको भांपकर वह मन ही मन खुश भी हुआ करती थी | उसके ख़्वाबों की लड़ी तब टूटी जब राजू रोता हुआ आया और माँ से बोला माँ-माँ मुझे भी पतंग ले दो न | वो लोग मुझे पतंग नहीं दिखाते | सुलेखा बोली कोई बात नहीं बेटे पापा अभी शाम को आ जायेंगे और तुझे बहुत सारी  पतंग ले देंगे | अच्छे बच्चे रोते नहीं हैं बेटे | माँ के प्यार से पुचकारने से बच्चा चुप होकर वापिस बच्चो के बीच चला गया | सुलेखा ने जाते हुए बच्चे से नज़र हटा कर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी पर नज़र डाली जिसमें  दुपहर के दो बजे थे | उसके पति को घर लौटने में अभी चार घंटे बाकि थे | वह अभी सोच ही रही थी कि बाज़ार जाकर अगले दिन के लिए तरकारी भाजी आदि ले आये | क्यूंकि शाम को उसके पति उसे घर से बाहर निकलने नहीं देते थे | इतने में पडौस में रहने वाली एक महिला उसके पास आकर बोली भई सुलेखा क्या कर रही हो ?  सुलेखा बोली – करना क्या है रामकली, बस शाम तक का वक़्त काट रही हूँ | "भई लगता है कि मियाँ बिन दिल नहीं लगता"—रामकली चटकारे लेते हुए बोली | "नहीं- नहीं  ऎसी बात तो नहीं है"--- बात को आगे न बढ़ाते हुए सुलेखा ने कहा – "तुम बताओ तुम कहाँ चली इतना सज़-धज कर" | रामकली बोली--" मैं तो लाजो को लेने उसके घर जा रही हूँ | वहां से हम दिल्ली में चांदनी चौक जायेंगे | वहाँ सुना है एक योगी महाराज आये हैं | जो कि बिना कुछ लिए दिए भविष्य का सब हाल बता देते हैं | अगर तुमने चलना है तो चल हमारे संग |तेरे उनके आने से पहले ही घर लौट आयेंगे" |
                सुलेखा को अपने भविष्य के बारे में जानने में वैसे भी बड़ी जिज्ञासा लगी रहती थी | सो वह दो मकान छोड़ कर, अपने पति रामकिशन के दोस्त रमेश के यहाँ गई और राजू का ध्यान रखने को कहकर, रामकली के साथ चल दी | वहाँ से तीनों सहेलियां दिल्ली के चांदनी चौक में उस योगी के पास पहुंची |  वहाँ काफी संख्या में लोग बैठे थे | लेकिन इसके बावजूद वहाँ शोरगुल नहीं था | वह तीनों भी उनके बीच जा बैठी | योगी महाराज आँख बंद कर अपना आसन जमाये बड़े सहज भाव से अपने एक शिष्य के द्वारा एक एक करके सब को अपने पास बुला रहे थे | योगी महाराज की उम्र लगभग ३० और ३५ वर्ष के बीच लग रही थी | देखने में एक साधारण से पुरुष लग रहे थे | उनके और लोगों के बीच इतना फासला ज़रूर था कि उनके पास बैठे व्यक्ति के अतिरिक्त उनकी आवाज़ किसी दुसरे को सुनाई नहीं पड रही थी | पता नहीं सुलेखा को अपने भविष्य के बारे में योगी के पास जाते हुए बहुत डर सा महसूस हो रहा था | धड़कन अभी से तेज़ हुई जा रही थी | हालांकि अभी ये भी मालूम नहीं था कि उसका नम्बर आएगा भी के नहीं | अभी वह ये सब सोच ही रही थी कि गुरु जी के शिष्य ने आवाज़ लगाई ‘सुलेखा देवी’ !!!
              सुलेखा, अपना नाम उस व्यक्ति के मुख से सुनकर हैरान हो कर इधर-उधर देखने लगी | वह सोचने लगी कि किसी ओर सुलेखा देवी को बुलाया होगा, लिहाजा वो अपनी जगह पर वैसे ही बैठी रही | दो तीन आवाज़ लगाने पर भी जब वह नहीं उठी तो योगी महाराज जी ने खुद सुलेखा देवी की तरफ उंगली का इशारा करते हुए आगे आने को कहा | यह देख सुलेखा ने पहले पीछे मुड कर देखा फिर अपने वक्ष पर हाथ रख कर , अपने को संबोधित कर कहा ‘मैं’ ??  दिमाग से चारो खाने चित वो उनकी ओर चल दी और पास जाकर हाथ जोड़कर बैठ गई | योगी महाराज ने उसी प्रकार अपनी आँखें मूँद ली और कुछ क्षण बाद सुलेखा को बोले –बेटा तुम सीधे घर जाओ | तुम्हारी इस वक़्त घर में बहुत आवश्यकता है | सुलेखा पहले ही बहुत घबरा रही थी | अब इस बात पर महाराज जी के इस कथन से पसीना-पसीना हो गई | चाहते हुए भी मुँह से एक शब्द भी न निकल पाया | बिना आँखे खोले योगी महाराज बोले –बेटा  ज़िंदगी में घबराना नहीं , अभी बहुत कुछ झेलना बाकी है | बहुत लम्बी ज़िंदगी है जो अकेले ही गुजारनी है | घर जाओ वहां तुम्हारी इस वक़्त बहुत ज़रुरत है |
                   सुलेखा घब्रई हुई वहां से अपनी सहेलियों की परवाह किये बिना निकली और बस अड्डे से बस पकड़ अपने गाँव आकर रुकी | घर के नज़दीक पहुंची तो उसके होश फाख्ता हो गए | उसके घर के आसपास काफी भीड़ थी | उसका दिल धक् से रह गया | वहां लोग उसी के इंतज़ार में थे | उनमें से एक शख्स ने उसे झट से बताया कि उसके पति राम किशन का आरे से, एक हाथ और एक पाँव कट गया है | उसे अस्पताल ले गए हैं | ये सुन उसके हाथ पाँव फूलने लगे | लोगों के दिलासा देने पर अधमरी सी सुलेखा किसी तरह उस अस्पताल पहुंची | वहाँ की खस्ता हालत देखकर सुलेखा ने हिम्मत दिखाकर उसे एक प्राईवेट अस्पतान में भर्ती करवाया |
                  ज़िंदगी और मौत में काफी कशमकश के बाद अपाहिज होकर एक हाथ और एक पाँव के साथ तीन महीने बाद वह घर वापिस घर लौटा | अप्रैल का महीना था..गर्मी बढ़ने लगी थी | अगले तीन महीनों में घर की सारी  जामा पूँजी बीमारी में समाप्त हो चुकी थी | इस हालत में रामकिशन का मालिक कब तक साथ निभाता | लिहाजा उसने भी मकान खाली करने का नोटिस दे दिया | नौकरी तो पहले ही जा चुकी थी अब बे-घर होने का समय भी आ गया  |किसी तरह सुलेखा ने रिश्तेदारों की मार्फ़त दिल्ली में करोल बाग़ के नज़दीक  देवनगर में एक कमरा किराए परले लिया | जिसका किराया मकान मालिक के घर बर्तन सफाई तथा खाना पकाने के काम से चुकाना था | इसके इलावा दो सो रूपये तय हुआ | यह कमरा उस मकान की चौथी मंजिल पर था | कमरे के आगे खाली छत थी | जहां रामकिशन बैसाखी के सहारे इधर-उधर घूम लेता था | वह अपनी ज़िंदगी से काफी बेजार हो चूका था | तथा स्वभाव से भी काफी चिडचिडा भी हो चुका था | बात-बात पर अपनी पत्नी और बच्चे को डांट दिया करता था | सुलेखा सुबह शाम नीचे मालिक के यहाँ काम करती तथा खाने के वक़्त ऊपर अपने पति तथा बच्चे को खाना दे जाया करती |
                 इसी बीच दो महीने और बीत गए | कड़कती धुप शुरू हो चुकी थी | बरसाती में वैसे भी गरमी जियादा लगती थी | इस तरह ज़िंदगी बीतने लगी | राजू रोज़ सकूल से आता और छत पर पतंगों की ओर देखता रहता | कभी-कभी कोई पतंग उसकी छत पर आ जाती , वह बहुत खुश हो जाता | उसे इधर-उधर भाग कर कभी उडाता और कभी छत से नीचे की ओर लटकाता | पतंग फट जाती तो पापा के पास पतंग की फरमाईश करता | पापा उसे डांट देते तो बहार लौट आता | फिर मायूस होकर आसमान पर फिर से पतंगों को निहारता रहता | उसकी छत काफी हवादार थी | क्यूंकि उनके मकानों के दोनों ओर कोई मकान नहीं था | एक तरफ सड़क थी तथा दूसरी और एक मंजिल का खाली मकान था जो एक खंडहर में तब्दील हो चूका था क्यूंकि उसमें कोई रहता नहीं था | उसकी मकान की छत भी टूटी हुई थी | राजू कभी सड़क की तरफ झांकता कभी उस खंडहर की तरफ | क्यूंकि जो पतंग कट कर आती – वह कभी सड़क की तरफ चली जाती तो कभी उस खँडहर में गिर जाती | राजू मन मसोस कर रह जाता और मायूस होकर उस खंडहर में पड़ी पतंग को देखता रहता | उसके मायूस चेहरे को देखकर उसकी माँ मन ही मन घुट्ती रहती---- मगर क्या करती | उसके लिए गृहस्ती चलाना इतना मुश्किल हो गया था कि पतंग खरीदने के लिए चाह  कर भी पैसे नहीं निकाल पाती थी | राजू माँ के पास पतंग के लिए मांग करने आता तो माँ उसे अगले दिन लाने के लिए कह कर बहला फूसला देती | राजू अगले दिन की इंतज़ार में,  वो दिन भी ख़ुशी से गुज़ार देता |
                         दिन पर दिन बीतते पतंगों को उड़ाने का महान दिन १५ अगस्त समीप आ गया | सुबह-सुबह अर्थात १४  अगस्त को जब राजू उठा तो उठते ही माँ से कहने लगा कि  माँ – माँ आज तो मुझे पतंग ले दोगी न ? मैं कल पतंग उड़ाऊँगा कल १५ अगस्त है न | माँ ने बच्चे के सर पर हाथ फेरकर कहा – हाँ बेटे तू जब स्कूल से आएगा तो तुझे बाज़ार से बहुत सी पतंगे ला दूंगी | राजू ख़ुशी ख़ुशी स्कूल चला गया और दोस्तों को अपनी ख़ुशी में शामिल किया | स्कूल में १४ अगस्त को आज़ादी का कार्यक्रम था जिसमें उसने भी भाग लिया और उसने पतंग के ऊपर ही एक कविता भी वहाँ सुनाई | जिसके बोल थे ---


मेरे घर जब आई पतंग
पापा को न भाई पतंग |
छुप-छुप मैंने जब उड़ाया,
खुशियों के रंग लाई पतंग |

एक छोटा सा इनाम लेकर वो जब घर पहुंचा तो  माँ को चारपाई पर लेता देखकर थोडा घबरा सा गया | क्यूंकि अपनी छोटी सी ज़िंदगी में उसने माँ को इस समय कभी चारपाई पर आराम करते नहीं देखा था | वह जल्दी-जल्दी भागता हुआ माँ के पास आया और नन्हा सा इनाम माँ को दिखाते हुए पुछा माँ- माँ आपको क्या हुआ | सुलेखा ने उसका इनाम हाथ में लेकर देखा और शाबाशी दी और धीमी सी आवाज़ में बोली कुछ नहीं हुआ बेटा थोडा सा बुखार है | राजू मन ही मन उदास हो गया | उसकी सारी उमीदों पर पानी फिर गया | वो समझ चुका था कि अब उसकी पतंग नहीं आएगी | वह चुपचाप माँ के सर पर हाथ सहलाता हुआ छत की तरफ चल दिया | माँ का अहसास आँखों से टपकने लगा | लेकिन वह कुछ नहीं कर सकती थी | पैसे के अभाव में उसे बच्चे के सामने बीमारी का नाटक करना पड़ेगा ...ऐसा कभी उसने सपने में भी नहीं सोचा था | अगला दिन १५ अगस्त था | सूबह -सुबह राजू  ७  बजे उठा और अपने लिहाज़ से सबसे अच्छे कपडे निकाल कर नहा धोकर तैयार हो गया और छत पर खड़ा हो गया | बहुत सारी पतंगे आसमान में झूल रही थीं | हवा काफी तेज़ थी | उसकी नज़र एक रंग बिरंगी पतंग पर थी | जो देखने में बहुत सुंदर नज़र आ रहा ही | वह पतंग उसकी छत के आसपास इधर-उधर मंडरा रही थी | उसकी बड़ी तमना थी कि यह पतंग उसके पास होती | क्यूंकि वह कई पतंगों को काट रही थी और जो पतंग कट जाती वह पतंग उसकी छत के ऊपर से होकर गुज़र जाती | राजू छत पर इधर-उधर भागता मगर कोई भी पतंग उसके हाथ न लगती | माँ जब ये सब देखती उसकी आँखों में हलके से आंसू गाल से नीचे लुडक जाते | आज वह राजू के लिए मालिक से छुट्टी भी ले चुकी थी और चारपाई पर बैठी राजू को ही देख रही थी | राजू इधर-उधर भागकर फिर उसी रंग-बिरंगी पतंग की तरफ देखने लगता जो उसके मन-पसंद की थी | इतने में उसने देखा वह पतंग किसी ओर पतंग के साथ गुत्थमगुत्था होकर उसकी छत की तरफ झुकी और कट गई | राजू का दिल धक् से रह गया और वह उस पतंग की तरफ लपका | वह पतंग उस खंडहर के ऊपर लहर रही थी | राजू ने अपना हाथ आगे बढाया | राजू को इस तरह पतंग के पीछे भागता देखकर सुलेखा एकदम उसकी ओर लपकी मगर तब तक राजू की एक लंबी चीख माँ की चीख के साथ मिल चुकी थी | इतनी भयानक चीख सुन बिजली की फूर्ती से राजू के पापा ने अपनी बैसाखी उठाई और वह भी उस ओर लपके जिस ओर की मुंडेर से राजू नीचे गिरा था | भावावेश में जैसे ही उसने नीचे झाँका , नीचे का द्रश्य देखकर रामकिशन वहीँ ढेर हो गया | सुलेखा यह सब देख खामोश हो गई | क्यूंकि अब उसकी ज़िंदगी एक कटी पतंग बन चुकी थी | वह देख रही थी जिस पतंग के पीछे राजू भागा था वही पतंग उसके शिथिल शरीर पर पड़ी थी |
             आज भी बरसों बाद उस योगी महाराज के शब्द उसके दिमाग में घुमते हैं कि        " ज़िंदगी में कभी घबराना नहीं | अभी बहुत कुछ झेलना बाकी है | बहुत लम्बी ज़िंदगी है जो अकेले गुजारनी है |"

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